|

विजयदशमी विशेष: रावण का बढ़ता कद, बुद्धिजीवियों की चुप्पी और आस्था की आड़ में सुरक्षित सत्ता का खेल

बिलासपुर/रायपुर।

कल देश, प्रदेश और न्यायधानी बिलासपुर संभाग में विजयदशमी (दशहरा) का त्यौहार धूमधाम से मनाया जाएगा। हर साल की तरह इस बार भी गली-मोहल्लों, चौराहों और बड़े मैदानों में ‘अधर्म पर धर्म’ और ‘बुराई पर अच्छाई की जीत’ का संदेश देने वाले मंच सज चुके हैं। गगनचुंबी पंडाल, भव्य मूर्तियां और बाहर फ्री में बंटते मेवे-मिष्ठान लोगों को अपनी ओर खींच रहे हैं। धर्म और उत्सव के इस चकाचौंध भरे आगोश में आम जनता से लेकर समाज का तथाकथित पढ़ा-लिखا वर्ग भी खुद-ब-खुद खिंचा चला जा रहा है।

​लेकिन इस भव्यता के पीछे एक कड़वा सवाल यह है कि हम हर साल रावण का पुतला तो बड़ा करते जा रहे हैं, लेकिन क्या हमारे समाज से बुराइयां छोटी हो रही हैं?

​1. रावण का कद बढ़ा, पर मन का कपट भी दोगुना हुआ

​आज देश और प्रदेश में ‘सबसे बड़ा रावण’ बनाने की अंधी होड़ लगी है। जिसे देखो, वह अपने क्षेत्र के रावण के पुतले को सबसे ऊंचा बताकर सुर्खियां बटोरना चाहता है।

​पुतले का आकार बढ़ाकर और उसे आतिशबाजी के साथ दहन करने से केवल कुछ समय का कौतूहल पैदा होता है। हकीकत यह है कि जैसे-जैसे कागज़ और बांस के बने रावण का कद बढ़ रहा है, ठीक उसी रफ्तार से इंसान के अंदर का छल-कपट, लालच और अपराध का कद भी बढ़ रहा है। यदि बीते 10 या 15 वर्षों से तुलना की जाए, तो क्या समाज में अपराध और बुराइयां कम हुई हैं? आंकड़े और रोज की घटनाएं चीख-चीख कर कहती हैं कि बुराइयां कम होने के बजाय और ज्यादा भयावह रूप ले चुकी हैं।

​2. बुद्धिजीवियों और व्यापारियों का मौन समर्थन: जब समझदारी भी आस्था के आगे घुटने टेक दे

​इस पूरी व्यवस्था का सबसे डरावना पहलू यह है कि इस ध्यान भटकाने वाले तमाशे और उत्सवधर्मिता के आगोश में केवल आम और अनपढ़ वर्ग ही नहीं, बल्कि वह बुद्धिजीवी वर्ग भी पूरी तरह फंस चुका है जो उच्च शिक्षा प्राप्त कर बड़े-बड़े पदों पर बैठा है, या फिर बड़े-बड़े व्यापारिक घरानों से जुड़ा है।

​जब समाज के डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, प्रशासनिक अधिकारी और बड़े व्यापारी खुद इन आयोजनों के प्रायोजक बन जाते हैं, तो अन्याय और घोटालों के खिलाफ उठने वाली हर आवाज स्वतः घुट घुट कर दम तोड़ देती है। आज स्थिति यह है कि सभ्यता और संस्कृति के नाम पर तीज-त्यौहार और भगवान के प्रति अंधी आस्था का प्रचार केवल पर्वों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम रोजमर्रा की जिंदगी की नसों में घर कर गया है।

​छोटे-छोटे मासूम बच्चों से लेकर वृद्ध जनों तक—हर किसी के जेहन में धर्म और आस्था को इतना बढ़ा-चढ़ाकर और आक्रामक रूप से प्रदर्शित किया जा रहा है कि हर कोई तार्किक सवाल पूछने से डरने लगा है।

​3. सत्ता और विपक्ष: मंचों से बधाइयां, धरातल पर बर्बादी और घोटालों का लाइसेंस

​दशहरे के इन बड़े आयोजनों में सत्तापक्ष हो या विपक्ष, दोनों के नेता अग्रिम पंक्तियों में मुस्कुराते और तालियां बजाते दिखते हैं। मंच संभालते ही जोर-जोर से जनता को “सत्य और सदाचार” की बधाइयां दी जाती हैं।

​परंतु जब देश और प्रदेश की हालिया स्थिति पर नजर डालते हैं, तो हर विभाग में छल और कपट का बोलबाला नजर आता है:

​युवाओं के भविष्य से खिलवाड़: प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार धांधली और पेपर लीक होना आम बात बन चुकी है।

​राजनीतिक शुचिता की धज्जियां: इलेक्टोरल बॉन्ड के नाम पर “चंदा दो, धंधा लो” जैसी व्यवस्थाएं और वोट चोरी के गंभीर आरोप लोकतंत्र को खोखला कर रहे हैं।

​जनता पर मार: महंगाई, गरीबी और भुखमरी चरम पर है।

​बड़ा सच: धर्म और आस्था के इस भव्य प्रचार-प्रसार की आड़ में दरअसल सत्ता को हर प्रकार के घपले और घोटाले करने का एक खुला “लाइसेंस” मिल जाता है। जब तक जनता और बुद्धिजीवी वर्ग भगवान और संस्कृति की झूठी चादर में लिपटे रहेंगे, तब तक शासन करने वाले बेखौफ होकर देश की संपदा को लूटते रहेंगे।

​4. असली मुद्दों से भटकाव और आवाज दबाने का दौर

​इस पूरी चकाचौंध और भव्य आयोजनों के पीछे सबसे ज्यादा फायदा किसका हो रहा है? सीधा सा जवाब है—उन ताकतों का जो जनता का ध्यान देश के अहम मुद्दों से भटकाना चाहती हैं।

​जब देश की राजधानी दिल्ली या अन्य हिस्सों में नागरिक, छात्र या किसान अपने बुनियादी अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाते हैं, तो उन पर दमनचक्र चला दिया जाता है। स्वतंत्र पत्रकारों और जायज़ सवाल उठाने वाले लोगों को गृह मंत्री और प्रधानमंत्री के आदेशों के अनुसार डिटेन कर जेलों में ठूंस दिया जाता है। एक तरफ लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और जनता की आवाज़ को कुचला जा रहा है, तो दूसरी तरफ त्यौहारों और पंडालों के नाम पर भारी तमाशा खड़ा करके लोगों की सोचने-समझने की क्षमता को सुन्न किया जा रहा है।

​5. बिलासपुर संभाग में धर्म के नाम पर सजा बाज़ार

​बिलासपुर, रायपुर और पूरे संभाग के गली-चौराहों पर धर्म के नाम पर जो भीड़ जुट रही है, उसमें आस्था कम और भीड़तंत्र का राजनीतिक इस्तेमाल ज्यादा दिखता है। विशालकाय मूर्तियां, लाखों-करोड़ों के पंडाल और बाहर फ्री में बंटते मेवे-मिष्ठान लोगों को लुभाने का ज़रिया बन चुके हैं।

​इस चकाचौंध में डूबी जनता यह भूल जाती है कि जिस रावण को वे मैदान में जलता देख तालियां बजा रहे हैं, वही रावण भ्रष्टाचार, पेपर लीक, महंगाई और तानाशाही के रूप में उनके घरों की चूल्हें बुझा रहा है।

​निष्कर्ष: चिंतन का समय

​कल जब रावण का दहन होगा और आसमान पटाखों की गूंज से भर जाएगा, तब खुद से एक सवाल ज़रूर पूछिएगा—क्या पुतला जलाने से समाज की बुराई जल जाएगी? या फिर हम हर साल रावण को सिर्फ इसलिए बड़ा और भव्य बना रहे हैं ताकि हमारे समाज के बुद्धिजीवियों की चुप्पी और सत्ता के पाले हुए असली रावण पूरी तरह सुरक्षित रहें?

​अगर आस्था केवल तमाशा और मुद्दों से भटकाने का साधन बन जाए, तो यह किसी संस्कृति का उत्थान नहीं, बल्कि एक जागरूक राष्ट्र के बौद्धिक और नैतिक पतन की शुरुआत है।

अन्य खबरें