मुंगेली जनसंपर्क भ्रष्टाचार मामला: तूता में सत्याग्रह के बाद हरकत में आया प्रशासन; संचालनालय ने गठित की दो सदस्यीय जांच टीम
तीन दिवस के भीतर मांगी गई प्रारंभिक जांच रिपोर्ट; ₹32-35 लाख की कथित अवैध वसूली और वित्तीय अनियमितता की होगी सूक्ष्म पड़ताल

विशेष संवाददाता | रायपुर / मुंगेली
मुंगेली जिले में पदस्थापना के दौरान तत्काली जिला पंचायत सीईओ एवं तत्कालीन सहायक संचालक/जनसंपर्क अधिकारी (DPRO) पर लगे ₹32 से ₹35 लाख की कथित वित्तीय अनियमितता के गंभीर आरोपों में शासन स्तर पर बड़ी प्रशासनिक हलचल शुरू हो गई है। नवा रायपुर स्थित तूता धरना स्थल पर मीडिया प्रतिनिधि खेमेश्वर पुरी गोस्वामी द्वारा किए गए अनिश्चितकालीन सत्याग्रह और शिकायतों के बाद जनसंपर्क संचालनालय, छत्तीसगढ़ ने मामले को संज्ञान में लेते हुए उच्चस्तरीय दो सदस्यीय जांच दल का गठन कर दिया है।

आयुक्त जनसंपर्क के अनुमोदन से जारी इस आदेश में जांच अधिकारियों को प्रकरण की वस्तुस्थिति स्पष्ट करते हुए तीन कार्यदिवसों के भीतर स्पष्ट अभिमत सहित प्रारंभिक जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के सख्त निर्देश दिए गए हैं।

₹32-35 लाख की अवैध वसूली का आरोप
शिकायतकर्ता खेमेश्वर पुरी गोस्वामी द्वारा मुख्यमंत्री हेल्पलाइन (1076) में दर्ज शिकायत (क्रमांक WP260500179499) के अनुसार, मुंगेली में पदस्थापना के दौरान तत्कालीन जिला पंचायत सीईओ गोकुल रावटे एवं तत्कालीन डीपीआरओ सुजीत सिंह पर स्वतंत्रता दिवस एवं सौजन्य भेंट के नाम पर शासकीय विभागों से कथित रूप से ₹32 से ₹35 लाख की अवैध वसूली कर राशि का बंदरबांट करने का आरोप लगाया गया था।

वरिष्ठ अधिकारियों को सौंपी गई जांच की कमान
जनसंपर्क संचालनालय द्वारा 9 अक्टूबर 2026 को जारी कार्यालयीन आदेश (क्रमांक 5559) के तहत मामले की निष्पक्ष जांच हेतु दो वरिष्ठ अधिकारियों को जांचकर्ता नियुक्त किया गया है:
- संतोष मौर्य – अपर संचालक, जनसंपर्क संचालनालय, नवा रायपुर
- जितेन्द्र नागेश – संयुक्त संचालक, जनसंपर्क संचालनालय, नवा रायपुर
आदेश की प्रतियां मुंगेली कलेक्टर, जनसंपर्क विभाग के उप सचिव, संभागीय संयुक्त संचालक बिलासपुर और संबंधित अधिकारियों को सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्रवाई हेतु प्रेषित की गई हैं।

सत्याग्रह का दिखा असर, लेकिन जांच प्रक्रिया पर उठे विधिक सवाल
सत्याग्रह के दबाव में प्रशासन द्वारा प्राथमिक जांच बिठाना निश्चित ही स्वागतयोग्य कदम है, किंतु इस जांच आदेश से एक गंभीर विधिक विसंगति और प्रशासनिक चूक भी सामने आई है।
आदेश पत्र की प्रतिलिपि (पृष्ठ 1 व 2) के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि संचालनालय ने कलेक्टर, उप सचिव, संभागीय संयुक्त संचालक एवं संबंधित आरोपी अधिकारियों तक को आदेश की प्रति भेजी है, लेकिन मूल शिकायतकर्ता खेमेश्वर पुरी गोस्वामी को इसकी कोई अधिकृत सूचना या प्रतिलिपि प्रेषित नहीं की गई है।


’एकतरफा जांच’ और प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन?
प्रशासनिक व विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शिकायत पर गठित जांच की सूचना मूल शिकायतकर्ता को न देना ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत’ (Principles of Natural Justice) और संविधान के अनुच्छेद 14 का स्पष्ट उल्लंघन है। शिकायतकर्ता को शामिल किए बिना की गई जांच ‘एकतरफा’ (Ex-Parte) होने का खतरा पैदा करती है, जिससे जांच की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
शिकायतकर्ता का रुख:
अनशनकारी व शिकायतकर्ता खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ने स्पष्ट किया है कि “यदि जांच दल शिकायतकर्ता के बयान दर्ज किए बिना और साक्ष्य संकलित किए बिना एकतरफा रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, तो इस प्रक्रिया को प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन के आधार पर माननीय उच्च न्यायालय (High Court) में चुनौती दी जाएगी। हम अदालत से मांग करेंगे कि ऐसी एकतरफा जांच को निरस्त कर स्वतंत्र या न्यायिक निगरानी में निष्पक्ष जांच कराई जाए।”
अब निगाहें तीन दिनों की मियाद और प्रशासनिक शुचिता पर
सत्याग्रह के कारण शासन को प्राथमिक संज्ञान तो लेना पड़ा है, लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या गठित जांच दल तीन दिनों की तय समय-सीमा के भीतर निष्पक्ष साक्ष्यों का संकलन करेगा? लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच पारदर्शिता व विश्वसनीयता तभी कायम हो सकेगी जब जांच प्रक्रिया में शिकायतकर्ता को विधिवत नोटिस देकर उनके साक्ष्य शामिल किए जाएं।
