जिला प्रशासन की वाहवाही पर भारी किसानों की बदहाली, रकबा समर्पण और मिलों पर ताले — सब सवालों के घेरे में
जिला प्रशासन की वाहवाही पर भारी किसानों की बदहाली, रकबा समर्पण और मिलों पर ताले — सब सवालों के घेरे में
मुंगेली | विशेष रिपोर्ट
एक ओर जिला प्रशासन रिकॉर्ड धान खरीदी और भुगतान के आंकड़े गिनाकर अपनी पीठ थपथपा रहा है, तो दूसरी ओर जिले का किसान आज सबसे ज्यादा ठगा हुआ और असहाय महसूस कर रहा है। प्रशासन की इसी “उपलब्धि नीति” के पीछे हजारों किसानों की मेहनत, नुकसान और मजबूरी दबा दी गई है।
ग्राफ सुधारने के लिए किसानों से जबरन रकबा समर्पण

सूत्रों के अनुसार, जिले में बड़ी संख्या में किसानों से दबाव बनाकर रकबा समर्पण कराया गया, ताकि सरकारी रिपोर्ट और लक्ष्य पूरे किए जा सकें। इसके कारण हजारों किसान इस बार समर्थन मूल्य पर धान बेचने से वंचित रह गए और उन्हें करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ा।
मजबूरी में समर्पण, नहीं थी कोई और राह
तकनीकी खामियां, टोकन सिस्टम की गड़बड़ी, स्लॉट की कमी और खरीदी केंद्रों की अव्यवस्था ने किसानों को इतना परेशान किया कि अंततः उन्हें रकबा समर्पण का रास्ता अपनाना पड़ा। कई किसानों का धान गोदामों और खेतों में ही खराब होने लगा।

अधिया प्रथा और बढ़ती गरीबी
गरीबी के चलते किसान अपनी जमीन अधिया पर देने को मजबूर हैं। आधा उत्पादन अधियार को और आधा मालिक को मिलता है, फिर भी पंजीयन मालिक के नाम होता है। जरूरत पड़ने पर किसान दूसरों से धान खरीदकर बेचते हैं, जिसे प्रशासन “गलत” बताकर कार्रवाई का आधार बना लेता है।
गरीब पर सख्ती, व्यापारियों पर नरमी
नकली खाद, बीज, दवाइयां, पेट्रोल-डीजल और एमआरपी से ऊपर बिक्री पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, लेकिन किसान के मामले में प्रशासन पूरी ताकत दिखाता है। यही दोहरा मापदंड किसानों में आक्रोश पैदा कर रहा है।
मिलों पर ताले: कार्रवाई या दिखावा?
इस पूरे मामले में अब एक और बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।
जिले की जिन मिलों पर फिलहाल ताले लगाए गए हैं—
क्या ये ताले किसानों की पूरी धान खरीदी होने के बाद भी ऐसे ही लटके रहेंगे?
या फिर चुपचाप, पर्दे के पीछे, किसानों की आंखों में धूल झोंकते हुए इन्हें दोबारा खोल दिया जाएगा?

किसानों का कहना है कि पहले भी कई बार “कड़ी कार्रवाई” के नाम पर केवल दिखावा किया गया, और कुछ समय बाद वही मिलर्स फिर से सक्रिय हो गए।
हर साल दोहराई जाती है वही कहानी
पिछले साल की तरह इस साल भी बड़े पैमाने पर रकबा समर्पण हुआ, किसान घाटे में गया, लेकिन प्रशासन वाहवाही बटोरता रहा। जमीन पर हालात नहीं बदले, सिर्फ आंकड़े बदले गए।
किसानों की आवाज: “हम आंकड़ों का हिस्सा नहीं, जीते-जागते इंसान हैं”
किसानों का दर्द साफ झलकता है—
“कागजों में हम समृद्ध हैं,
हकीकत में कर्ज और चिंता में डूबे हैं।
हमारी मजबूरी को अपराध बना दिया गया है।”
अब सबसे बड़े सवाल
क्या रकबा समर्पण की जबरदस्ती की जांच होगी?
क्या किसानों को हुए नुकसान की भरपाई होगी?
क्या दोषी मिलर्स पर स्थायी कार्रवाई होगी?
या फिर सब कुछ कुछ दिनों बाद ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलता, तब तक “रिकॉर्ड धान खरीदी” का दावा किसानों के लिए केवल एक खोखला प्रचार ही बना रहेगा।
