जिला प्रशासन की वाहवाही पर भारी किसानों की बदहाली, रकबा समर्पण, मिलों पर ताले और ज्ञापन — सब सवालों के घेरे में
मुंगेली | विशेष रिपोर्ट
एक ओर जिला प्रशासन रिकॉर्ड धान खरीदी के आंकड़े पेश कर अपनी पीठ थपथपा रहा है, तो दूसरी ओर जिले के किसान बदहाली, नुकसान और अनदेखी का शिकार होते जा रहे हैं। अब इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी विरोध तेज होने लगा है।

इसी कड़ी में कांग्रेस नेता दीपक गुप्ता, अध्यक्ष (ब्लॉक कांग्रेस कमेटी मुंगेली) के नेतृत्व में किसानों की समस्याओं को लेकर महामहिम राज्यपाल के नाम जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपा गया है।
ज्ञापन में उठाई गई किसानों की गंभीर समस्याएं
ज्ञापन में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि—
मनरेगा कानून में हुए बदलाव से मजदूर और किसान दोनों प्रभावित हुए हैं
समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की अंतिम तिथि 31 जनवरी निर्धारित होने के बावजूद
बड़ी संख्या में किसान अब तक अपना धान नहीं बेच पाए हैं
इससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है

ज्ञापन में मांग की गई है कि धान खरीदी की तिथि बढ़ाई जाए, ताकि प्रदेश के किसान अपनी उपज बेच सकें और उन्हें उचित लाभ मिल सके।
इस ज्ञापन पर बड़ी संख्या में किसानों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के हस्ताक्षर भी हैं, जो जिले में फैली नाराजगी को साफ दर्शाते हैं।
ग्राफ सुधारने के लिए किसानों से जबरन रकबा समर्पण
सूत्रों के अनुसार, प्रशासन द्वारा लक्ष्य और रिपोर्ट बेहतर दिखाने के लिए किसानों पर रकबा समर्पण का दबाव बनाया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि हजारों किसान समर्थन मूल्य से वंचित रह गए और करोड़ों रुपये का नुकसान झेलने को मजबूर हुए।

मजबूरी में समर्पण, नहीं थी कोई और राह
टोकन सिस्टम की गड़बड़ी, स्लॉट की कमी, केंद्रों पर अव्यवस्था और देरी के कारण किसान समय पर धान नहीं बेच सके। अंततः उन्हें मजबूरी में रकबा समर्पण करना पड़ा।
अधिया प्रथा और बढ़ती गरीबी
गरीबी के चलते किसान अपनी जमीन अधिया पर देने को मजबूर हैं। आधा उत्पादन अधियार को चला जाता है। फिर भी पंजीयन मालिक के नाम रहता है। जरूरत पड़ने पर किसान दूसरों से धान खरीदकर बेचते हैं,

जिसे प्रशासन “अनियमितता” बताकर कार्रवाई करता है।
गरीब किसान पर सख्ती, व्यापारियों पर नरमी
जहां नकली खाद-बीज, महंगी दवाइयां, पेट्रोल-डीजल और एमआरपी से अधिक वसूली पर ढीली कार्रवाई होती है, वहीं किसान के मामले में प्रशासन सख्ती दिखाता है। यही दोहरा मापदंड किसानों में रोष पैदा कर रहा है।
मिलों पर ताले: कार्रवाई या सिर्फ दिखावा?
जिले की जिन राइस मिलों पर फिलहाल ताले लगाए गए हैं, उसे लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं—
क्या किसानों की खरीदी पूरी होने के बाद भी ये ताले लगे रहेंगे?
या फिर पर्दे के पीछे सौदेबाजी कर इन्हें दोबारा खोल दिया जाएगा?
किसानों का कहना है कि पहले भी ऐसी “कड़ी कार्रवाई” कुछ समय बाद ढीली पड़ जाती रही है।
हर साल दोहराई जाती है वही कहानी
पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी बड़े पैमाने पर रकबा समर्पण हुआ, किसान घाटे में गया, लेकिन प्रशासन वाहवाही बटोरता रहा। जमीन पर हालात जस के तस बने हुए हैं।
किसानों की आवाज: “हम आंकड़े नहीं, इंसान हैं”
किसानों का कहना है—
“कागजों में हम करोड़ों के मालिक दिखते हैं,
लेकिन हकीकत में कर्ज और चिंता में डूबे हैं।
हमारी मजबूरी को अपराध बना दिया गया है।”
अब सबसे बड़े सवाल
क्या किसानों से जबरन कराए गए रकबा समर्पण की जांच होगी?
क्या धान खरीदी की तिथि बढ़ाने की मांग मानी जाएगी?
क्या ज्ञापन पर शासन गंभीरता से विचार करेगा?
क्या दोषी मिलर्स पर स्थायी कार्रवाई होगी?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक “रिकॉर्ड धान खरीदी” का दावा किसानों के लिए सिर्फ एक खोखला प्रचार ही बना रहेगा।
