स्वतंत्रता दिवस के नाम पर मुंगेली में ‘डाका’: बाहर से आकर कुर्सी पर बैठने वाले अफसरों का नया खेल, पत्रकारों के नाम पर शासकीय विभागों से लाखों की उगाही

छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले में राष्ट्रीय पर्व ‘स्वतंत्रता दिवस’ के पावन अवसर पर एक ऐसा शर्मनाक और संगठित वित्तीय घोटाला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक नैतिकता को तार-तार कर दिया है। पत्रकारों की “खुशामद” और “मिठाई-सौजन्य भेंट” के नाम पर जिले के विभिन्न शासकीय विभागों से 32 से 35 लाख रुपये की अवैध वसूली और बंदरबांट का सनसनीखेज मामला सामने आया है। इस पूरे फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ पत्रकार खेमेश्वर पुरी गोस्वामी की मुख्यमंत्री हेल्पलाइन (शिकायत क्र. WP260900176043) में दर्ज कराई गई शिकायत से हुआ है, जिसमें जिला पंचायत सीईओ गोकुल रावटे और तत्कालीन जनसंपर्क अधिकारी (DPRO) सुजीत सिंह (वर्तमान पदस्थापना रायगढ़) को मुख्य आरोपी बताया गया है।

​बाहरी अफसरों की दादागिरी: मीडिया दबाने का खेल और गुपचुप उगाही

अक्सर देखा गया है कि बाहर से आकर जिले की मलाईदार कुर्सियों (जैसे कलेक्टर या जिला पंचायत सीईओ) पर बैठने वाले बड़े अधिकारी सबसे पहले स्थानीय और स्वतंत्र मीडिया पर अंकुश लगाने की साजिश रचते हैं। ये अधिकारी अपनी मनगढ़ंत और झूठी उपलब्धियों की खबरें जनता पर थोपना चाहते हैं। इस पूरे तंत्र में जनसंपर्क अधिकारी (PRO) इन बड़े अफसरों और मीडिया के बीच मुख्य कड़ी का काम करता है।

​’गुड बुक्स’ का पैमाना: PRO सूची में उन्हीं पत्रकारों को जगह दी जाती है जो अफसरों की चापलूसी करते हैं। जो इस सूची से बाहर रहकर जनहित के सवाल पूछते हैं, उन्हें ये बाहरी अफसर “फर्जी” करार देकर तिरस्कृत करते हैं।

​सच्चाई दिखाने पर FIR की धमकी: यदि कोई निर्भीक पत्रकार इनकी झूठी खबरों से पर्दा उठाता है, तो तंत्र का इस्तेमाल कर उस पर झूठी एफआईआर (FIR) दर्ज कराई जाती है।

​पत्रकारों के नाम का इस्तेमाल: अधिकारियों के पास हर एक पत्रकार का ब्योरा होता है। गुड बुक्स में शामिल ‘चापलूस’ हों या सवाल पूछने वाले ‘विद्रोही’, अधिकारियों की नजर में सब बराबर हैं—कम से कम वसूली के समय! राष्ट्रीय पर्वों पर इन्हीं पत्रकारों के नाम का डर दिखाकर हर विभाग से 50 हजार से 1 लाख रुपये तक का लिफाफा ऐंठा जाता है।

​विभागों से 35 लाख का ‘कमिश्नर राज’, सीईओ बोले—’बड़े साहब ने कहा था’

शिकायत के अनुसार, मुंगेली के आहरण-संवितरण अधिकारियों (DDOs) पर दबाव बनाकर 32 से 35 लाख रुपये जुटाए गए और यह रकम DPRO सुजीत सिंह के हवाले कर दी गई। चौंकाने वाली बात यह है कि इस राशि का पत्रकारों के हित में 1% भी इस्तेमाल नहीं हुआ।

​जब इस विषय पर जिला पंचायत सीईओ गोकुल रावटे से बात की गई, तो उनके जवाब ने पूरे प्रशासनिक भ्रष्टाचार की पोल खोल दी। उन्होंने कहा—”मुझे इस मामले से दूर रखें, बड़े साहब ने कहा था इसलिए मैंने कुछ विभागों को सहयोग करने कहा था पर कोई राशि तय नहीं की गई थी, इसके लिए PRO स्वयं जिम्मेदार हैं।”

​सीईओ के इस बयान से साफ है कि यह सिर्फ दो निचले अधिकारियों का काम नहीं था, बल्कि जिले की सर्वोच्च सीट (तत्कालीन कलेक्टर कुंदन कुमार के कार्यकाल) के संरक्षण में खेला गया सुनियोजित खेल था।

​माफिया मानसिकता: गालियां, चाटुकारिता और पत्रकारों में बंटवारा

आरोप है कि फर्जीवाड़े की पोल खुलने पर आरोपी DPRO सुजीत सिंह ने पत्रकारों को अभद्र गालियां देते हुए “100-100 रुपये में बिकने वाले दलाल” तक कह डाला। जिस सुजीत सिंह पर पहले भी अन्य मामलों में गाज गिर चुकी है, उसका ऐसा दुस्साहस यह दर्शाता है कि उसे प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है।

​इस घटना के बाद मुंगेली का मीडिया जगत भी दो फाड़ में नजर आ रहा है:

​चापलूस गिरोह (गुड बुक्स वाले): जो अधिकारी के तलवे चाटते रहे हैं, वे अब भी अपने आकाओं का बचाव करने और उन्हें वापस लाने की जद्दोजहद में जुटे हैं।

​स्वाभिमानी और निष्पक्ष पत्रकार: वे इस घिनौने अपराध के खिलाफ एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) और ईओडब्ल्यू (EOW) से उच्च स्तरीय जांच तथा अधिकारियों पर तत्काल प्रशासनिक कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

​शासकीय विभागों को लताड़: क्यों बांटते हैं पत्रकारों के नाम पर अंधा पैसा?

यह सवाल उन शासकीय विभागों के अधिकारियों (DDOs) से भी पूछा जाना चाहिए जो अपनी कमजोरियों, बजट घोटालों और कमियों को छिपाने के लिए पत्रकारों के नाम पर किसी भी बड़े अफसर के कहने पर शासकीय राशि का लिफाफा थमा देते हैं।

​सीधा सवाल विभागों से: जब आपके पास पत्रकारों से सीधे संवाद का माध्यम है, तो आप किस हैसियत से किसी अफसर के निजी खाते या हाथ में पत्रकारों के नाम की वसूली का पैसा सौंपते हैं?

​बाद में यही विभाग पत्रकारों को शक की नजर से देखते हैं। विभागों को यह समझना होगा कि पत्रकारों के नाम पर यह उगाही उनकी अपनी कायरता का नतीजा है।

​मुख्य मांगें और आगे का रास्ता

​ACB / EOW से स्वतंत्र जांच: मुंगेली जिले के सभी DDOs के खातों का गुप्त वित्तीय ऑडिट (Special Financial Audit) कराया जाए ताकि पता चल सके कि किस-किस विभाग से कितनी अवैध राशि निकाली गई।

​साक्ष्यों से छेड़छाड़ पर रोक: जांच पूरी होने तक आरोपी अफसरों को तत्काल प्रभाव से निलंबित या स्थानांतरित किया जाए ताकि वे वित्तीय साक्ष्यों से छेड़छाड़ न कर सकें।

​पत्रकारिता की साख की रक्षा: चाटुकारिता में डूबे तथाकथित पत्रकारों को छोड़कर, पत्रकारिता के पेशे से जुड़े हर स्वाभिमानी साथी को अपने हक, सम्मान और साख को बचाने के लिए इस भ्रष्ट प्रशासनिक गठजोड़ के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठानी होगी।

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