मुंगेली जिला अस्पताल में ‘इमरजेंसी’ भी लाचार, जन्माष्टमी पर रेबीज टीका के लिए भटकता रहा पीड़ित: डॉक्टरों की मनमानी और प्रशासनिक उदासीनता चरम पर

मुंगेली जिला अस्पताल में ‘इमरजेंसी’ भी लाचार, जन्माष्टमी पर रेबीज टीका के लिए भटकता रहा पीड़ित: डॉक्टरों की मनमानी और प्रशासनिक उदासीनता चरम पर

​मुंगेली।

जिला प्रशासन के संज्ञान और कलेक्टर द्वारा सीएमएचओ को पूर्ण वित्तीय अधिकार देने के दावों के बावजूद मुंगेली जिला अस्पताल में डॉक्टरों और स्वास्थ्य अमले की निरंकुशता खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। मीडिया में पहले भी अस्पताल की अव्यवस्थाएं उजागर हो चुकी हैं, लेकिन धरातल पर रवैया जस का तस है। त्योहारों और सार्वजनिक अवकाश के दिनों में आपातकालीन सेवाएं भी महज औपचारिकता बनकर रह गई हैं।

​जन्माष्टमी पर आपातकालीन सेवा में टालमटोल

​कृष्ण जन्माष्टमी पर सामान्य ओपीडी बंद रहने और ग्रामीण इलाकों के उप-स्वास्थ्य केंद्रों में ताले लटके होने के कारण दूर-दराज के ग्रामीण जिला अस्पताल की आपातकालीन सेवा के भरोसे पहुंचे थे। परंतु, अस्पताल में पर्याप्त स्टाफ मौजूद होने के बाद भी मरीजों को टालने और भगाने का खेल चलता रहा।

​मामला दोपहर लगभग 2:30 बजे का है, जब एक पीड़ित व्यक्ति रेबीज का चौथा डोज लगवाने आपातकालीन विभाग पहुंचा। रेबीज का टीका तय समय पर लगना चिकित्सीय रूप से अनिवार्य होता है और मरीज की पर्ची में बाकायदा तारीख अंकित थी। इसके बावजूद, मौके पर तैनात डॉक्टर (स्थानीय लोगों के अनुसार डॉक्टर भास्कर) और उनके सहयोगी हिमांशु वाणी ने साफ इंकार करते हुए कहा कि “आज छुट्टी है, आपातकालीन दवाइयां ही रखी जाती हैं, यह इंजेक्शन आप कल भी लगवा सकते हैं।” मरीज के गुजारिश करने के बाद भी उसे बिना इलाज के लौटा दिया गया।

​आउटडेटेड सूचना पटल और प्रशासनिक आदेशों की अवहेलना

​अस्पताल में मरीजों को छोटे-छोटे कामों के लिए घंटों इंतजार कराना और मुख्य चिकित्सकों के निर्देशों को भी अधीनस्थ कर्मचारियों द्वारा टालना आम बात बन चुका है। पारदर्शिता का हाल यह है कि ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों और कर्मचारियों की जानकारी देने वाला सूचना पटल (ड्यूटी बोर्ड) भी अपडेट नहीं किया जाता। मरीज द्वारा खींचे गए फोटो में साफ देखा जा सकता है कि बोर्ड पर पुरानी तारीख ही दर्ज है, जिससे यह स्पष्ट नहीं होता कि मौके पर कौन सा डॉक्टर आधिकारिक रूप से जवाबदेह है।

​शिकायत न करने की लाचारी और व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी

​इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गंभीर पहलू यह है कि लगातार इस प्रकार की प्रशासनिक और चिकित्सीय निरंकुशता से जूझता आम नागरिक अब इसे अपनी ‘किस्मत’ मानकर छोड़ देता है। समय की बर्बादी और प्रक्रिया की जटिलता के डर से लोग ऊपर तक शिकायत करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते।

​यही कारण है कि कलेक्टर जनदर्शन या मुख्यमंत्री शिकायत हेल्पलाइन (1100) पर केवल आवास, पेंशन और राशन कार्ड जैसे आवेदन ही अधिक दिखाई देते हैं। आम जीवन में सरकारी दफ्तरों और अस्पतालों में झेलनी पड़ रही रोजमर्रा की बदसलूकी की शिकायतें उच्च अधिकारियों तक पहुंच ही नहीं पातीं। जब शिकायत दर्ज नहीं होती, तो इन सरकारी संस्थाओं में जारी अनैतिक व्यवहार और लापरवाही पर कोई कड़ा एक्शन भी नहीं हो पाता।

​स्वतः संज्ञान और कड़े अनुशासन की दरकार

​रेबीज जैसी घातक बीमारी में लापरवाही किसी की जान ले सकती है। जब तक आम जनता की शिकायतों का इंतजार किया जाएगा, तब तक यह निरंकुशता खत्म नहीं होगी। आवश्यकता इस बात की है कि जिला कलेक्टर और स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारी स्वयं ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर स्वतः संज्ञान (Suo Moto) लें। अस्पतालों में औचक निरीक्षण कर जनहित विरोधी रवैया अपनाने वाले डॉक्टरों और कर्मियों पर कड़ी अनुशासनात्मक व दंडात्मक कार्रवाई की जाए, ताकि शासकीय स्वास्थ्य सेवाओं पर आम जनता का विश्वास बहाल हो सके।

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