त्यौहार की आड़ में सरेआम गुंडागर्दी: भक्ति के नाम पर जबरन वसूली, हुड़दंग और ‘सड़क बंद’ का काला सच कब तक?

त्यौहार की आड़ में सरेआम गुंडागर्दी: भक्ति के नाम पर जबरन वसूली, हुड़दंग और ‘सड़क बंद’ का काला सच कब तक?

​कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर से शुरू हुआ त्यौहारों का यह मौसम आगामी गणेश चतुर्थी और नवरात्रि तक लगातार चलेगा। लेकिन इस धार्मिक उत्साह के बीच एक ऐसा भयावह और कड़वा सच छुपा है, जिसने आस्था की मूल भावना को ही तार-तार कर दिया है। आज जन्माष्टमी के मौके पर ही देश-प्रदेश के कई इलाकों से ऐसी तस्वीरें सामने आईं, जहां छोटे-छोटे मासूम बच्चे हाथों में रस्सी, तार और डंडे लेकर सड़कों के बीचों-बीच घेरा बनाकर खड़े दिखे।

​आम राहगीरों, बाइक चालकों और राह चलते लोगों को जबरन रोककर पैसे वसूले गए। भक्ति और भक्तिमय माहौल के नाम पर यह परंपरा अब हर त्यौहार का अभिन्न हिस्सा बनती जा रही है, जो कि अत्यंत चिंताजनक है।

​1. जन्माष्टमी से लेकर नवरात्रि तक: ‘टोल टैक्स’ बनी सरेआम दादागिरी

​आज जन्माष्टमी पर बच्चे और युवा सड़कों पर उतरकर रस्सी खींचते दिखे। आने वाले दिनों में जब गणेश उत्सव और दुर्गा पूजा (नवरात्रि) आएगी, तो यह समस्या और विकराल रूप ले लेगी।

​स्वेच्छा बनाम जबरन वसूली: यदि कोई नागरिक अपनी श्रद्धा से 11 या 21 रुपये देना चाहे, तो उसे जलील किया जाता है। मनमाफिक चंदा न देने पर सरेआम गाड़ियों की चाबी निकाल लेना, बहस करना और गाली-गलौज पर उतर आना अब आम बात है।

​संस्कारों का पतन: सबसे दुखद बात यह है कि मासूम बच्चों के हाथों में आज संस्कार और किताबें होने के बजाय सड़क रोकने वाले तार और डंडे थमा दिए गए हैं। बचपन से ही उन्हें ‘धर्म के नाम पर वसूली’ करना सिखाया जा रहा है।

​2. सकरी गलियां, विशाल पंडाल और डीजे का उत्पात

​शहर के व्यस्ततम इलाकों और गांवों की बेहद तंग गलियों में बड़े-बड़े पंडाल गाड़ दिए जाते हैं, जिससे आम जनता का पैदल चलना भी दूभर हो जाता है।

​आपातकालीन सेवाओं पर ब्रेक: इन अवैध पंडालों और सड़क घेराबंदी के कारण एम्बुलेंस, फायर ब्रिगेड और जरूरी काम से निकले नागरिक घंटों जाम में फंसे रहते हैं।

​अंधाधुंध लाइटें और अश्लील शोर: भक्ति के नाम पर देर रात तक लेजर/कुकिंग लाइटों की चकाचौंध के बीच कान फोड़ू डीजे बजाए जाते हैं। भक्ति गीतों की जगह भड़काऊ और फुहड़ गानों पर नाचना, शराब पीकर उपद्रव करना और आने-जाने वाली महिलाओं पर छींटाकशी करना अब पंडालों की काली हकीकत बन चुका है।

​3. कानून का डर खत्म और अंधभक्ति की नई पौध

​दिनदहाड़े सड़कों पर होने वाली इस गुंडागर्दी पर स्थानीय पुलिस और प्रशासन अक्सर ‘धार्मिक मामला’ समझकर आँखें मूंदे रहता है। पुलिस की इसी बेरुखी का फायदा उठाकर मनचले और असामाजिक तत्व चौराहों पर अपना दबदबा बना लेते हैं।

​धर्म की गलत परिभाषा: युवाओं की इस नई पीढ़ी को लगता है कि दूसरों का रास्ता रोकना, हुड़दंग मचाना और वसूली करना ही धर्म की सेवा है।

​अंधभक्तों का गिरोह: भक्ति के आवरण में उपद्रवियों का यह नया वर्ग तैयार हो रहा है, जिन्हें न तो कानून का डर है और न ही समाज की परवाह।

​निष्कर्ष: सुधार नहीं तो खत्म हो जाएगी आस्था की पवित्रता

​श्रीकृष्ण का संदेश कर्म और धर्म का था, न कि आम राहगीरों को परेशान करने का। गणेश जी और माँ दुर्गा के त्यौहार भी सामाजिक सौहार्द और शांति का प्रतीक हैं। यदि समय रहते प्रशासन ने सड़क रोककर चंदा वसूलने वाले इन गिरोहों पर नकेल नहीं कसी, तो त्यौहारों की पवित्रता पूरी तरह खत्म हो जाएगी।

​प्रशासन को सख्त रुख अपनाते हुए सड़कों पर बैरिकेडिंग और वसूली करने वालों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करने चाहिए। साथ ही समाज और अभिभावकों को भी जागना होगा—दूसरों को कष्ट देकर ली गई ‘वसूली’ से भगवान कभी प्रसन्न नहीं होते!

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