स्वतंत्रता तिथि एवं भारतीय कालगणना: सलधा धाम में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी ने फहराया राष्ट्रीय ध्वज।

स्वतंत्रता तिथि एवं भारतीय कालगणना: सलधा धाम में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी ने फहराया राष्ट्रीय ध्वज
उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ‘1008’ जी महाराज ने चातुर्मास्य व्रत एवं सपाद लक्षेश्वर महादेव प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान के पावन अवसर पर छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले स्थित प्रसिद्ध ‘सपाद लक्षेश्वर धाम’ (ग्राम सलधा) में श्रद्धालुओं की उपस्थिति में गरिमामय वातावरण के बीच राष्ट्रीय ध्वज का उत्तोलन किया।
श्रावण कृष्ण चतुर्दशी (स्वतंत्रता तिथि) के इस अवसर पर पूज्य शंकराचार्य जी ने देश की सांस्कृतिक स्वाधीनता, संवैधानिक चेतना एवं स्वदेशी कालगणना से जुड़े मौलिक विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए।
प्रमुख विचार एवं कार्यक्रम के मुख्य बिंदु:
श्रावण कृष्ण चतुर्दशी और वास्तविक स्वतंत्रता तिथि:
ध्वजोत्तोलन के पश्चात श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने कहा कि श्रावण कृष्ण चतुर्दशी की यह तिथि हमारे देश की वास्तविक स्वतंत्रता की पावन तिथि है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि जब भारत 1947 में औपनिवेशिक शासन से मुक्त हो चुका है, तो हमारी राष्ट्रीय उपलब्धियों एवं पर्वों का निर्धारण अंग्रेजी (ग्रेगोरियन) तारीखों के बजाय भारतीय पंचांग व तिथि परंपरा के अनुसार क्यों न हो? वास्तविक स्वाधीनता केवल राजनीतिक नियंत्रण का हस्तांतरण नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जड़ों की पुनर्प्रतिष्ठा में निहित है।

धर्म और राष्ट्रभक्ति का अटूट संगम:
शंकराचार्य जी ने रेखांकित किया कि सवा लाख शिवलिंगों की इस पवित्र स्थापना स्थली पर राष्ट्रीय ध्वज फहराना धर्म और राष्ट्रभक्ति के अटूट संगम का प्रतीक है। भारतीय संविधान की मूल भावना भी देश के बहुसांस्कृतिक और पारंपरिक ढांचे का सम्मान करती है।
विश्व में अद्वितीय ‘सपाद लक्षेश्वर धाम’ (सलधा):
छत्तीसगढ़ के बेमेतरा स्थित सलधा ग्राम में निर्मित हो रहा ‘सपाद लक्षेश्वर धाम’ सनातन संस्कृति का एक अनूठा और ऐतिहासिक केंद्र बनता जा रहा है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ श्रद्धालु एक ही स्थान पर एक साथ सवा लाख (1,25,000) शिवलिंगों एवं भगवान के 1,000 दिव्य स्वरूपों के दर्शन व पूजन का सौभाग्य प्राप्त कर सकेंगे। सनातन इतिहास में इस प्रकार का यह विश्व का एकमात्र देवालय होगा।

