​सच दिखाने की मिली सजा: आरक्षक की अय्याशी छुपाने के लिए पत्रकारों को बनाया निशाना

बिलासपुर। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर पुलिसिया तंत्र के प्रहार और पत्रकारों के खिलाफ एकतरफा कार्रवाई के विरोध में न्यायधानी बिलासपुर की सड़कों पर पत्रकारों का गुस्सा ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा। बिना निष्पक्ष जांच के दुर्भावनापूर्ण तरीके से पत्रकारों पर एफआईआर दर्ज किए जाने के विरोध में 19 जून शुक्रवार को जिलेभर के मीडियाकर्मियों ने ऐतिहासिक एकजुटता दिखाते हुए उग्र शक्ति प्रदर्शन किया। बिलासपुर पुलिस प्रशासन की इस तानाशाही और दमनकारी नीति के खिलाफ पत्रकारों ने सीधे सरकार और पुलिस महकमे को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

​इस पूरे मामले पर पुलिसिया कार्यप्रणाली की धज्जियां उड़ाती एक विशेष विस्तृत रिपोर्ट:

​न्यायधानी की सड़कों पर आक्रोश का सैलाब: एकजुट हुए जिलेभर के पत्रकार

​पुलिस प्रशासन की विफलताओं और दमनकारी रवैये के खिलाफ बिलासपुर शहर सहित बिल्हा, तखतपुर, मस्तूरी, सीपत, पचपेड़ी, सकरी, कोटा और चकरभाठा समेत पूरे जिले के कोने-कोने से पत्रकार एकजुट होकर सड़कों पर उतरे। राघवेन्द्र राव सभाभवन के पीछे स्थित कार्यालय से दोपहर ठीक एक बजे पत्रकारों की विशाल रैली निकली।

​यह रैली शहर के प्रमुख मार्गों से होती हुई जब शहीद विनोद चौबे चौक पहुंची, तो पूरा इलाका पुलिस प्रशासन के खिलाफ गगनभेदी नारों से गूंज उठा। रैली में पत्रकार “पहले जांच, फिर कार्रवाई”, “पत्रकार उत्पीड़न बंद करो” और “एकतरफा एफआईआर वापस लो” जैसी तख्तियां थामे अपनी आवाज बुलंद कर रहे थे। खास बात यह रही कि पुलिस की इस एकतरफा कार्रवाई के खिलाफ आम नागरिकों ने भी कई जगह सामने आकर पत्रकारों के इस आंदोलन को अपना खुला समर्थन दिया।

​सच दिखाने की मिली सजा: आरक्षक की अय्याशी छुपाने के लिए पत्रकारों को बनाया निशाना

​वरिष्ठ पत्रकारों ने जनसभा को संबोधित करते हुए बिलासपुर पुलिस की शर्मनाक कड़वी सच्चाई को उजागर किया। विवाद की जड़ वह वीडियो है जिसने बिलासपुर पुलिस की अनुशासनहीनता का सरेआम तमाशा बना दिया था।

​वीडियो में क्या था?: सिविल लाइन थाना के पुराने भवन के भीतर का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें एक आरक्षक खाकी वर्दी पहनकर जमीन पर नशे में धुत सोया हुआ दिखाई दे रहा था और उसी कमरे में शराब व बीयर की बोतलें बिखरी पड़ी थीं।

​कार्रवाई के बजाय दमन: इस शर्मनाक वीडियो के सार्वजनिक होने के बाद जब पत्रकार जिया खान, अनुज श्रीवास्तव और रायपुर के एक पत्रकार ने जनहित में इस खबर को पूरी जिम्मेदारी के साथ प्रकाशित किया (जिसमें पुलिस का पक्ष भी शामिल था), तो पुलिस बौखला गई। थाने में चल रहे इस ‘मधुशाला’ की जांच करने और दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई करने के बजाय, बिलासपुर पुलिस ने अपनी नाकामियों और भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए पूरा फोकस उन पत्रकारों पर केंद्रित कर दिया जिन्होंने सच को बेनकाब किया था।

​कानून और पत्रकार सुरक्षा कानून की सरेआम धज्जियां

​प्रदर्शनकारी पत्रकारों ने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि पत्रकारों के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर न केवल आनन-फानन में दुर्भावना से प्रेरित होकर की गई है, बल्कि इसमें शासन द्वारा निर्धारित पत्रकार सुरक्षा संबंधी अनिवार्य दिशा-निर्देशों और जांच प्रक्रिया को पूरी तरह से ठेंगा दिखा दिया गया है।

​प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार:

पत्रकारों ने दो टूक शब्दों में कहा कि यदि कोई पत्रकार वास्तव में दोषी है, तो उसके खिलाफ कानून के दायरे में निष्पक्ष जांच कर कठोर कार्रवाई की जाए, हमें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन अपनी वर्दी की धौंस दिखाकर, बिना किसी प्रारंभिक जांच और बिना ठोस साक्ष्यों के रातों-रात पत्रकारों को अपराधी (आरोपी) बना देना लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोंटने जैसा है।

​शासन-प्रशासन को सीधी चेतावनी: वापस लें एकतरफा एफआईआर, नहीं तो उग्र होगा आंदोलन

​बिलासपुर के पत्रकारों का यह अभूतपूर्व शक्ति प्रदर्शन पुलिस और सरकार के लिए एक कड़ा संदेश है। पुलिस अपनी कमियों पर पर्दा डालने के लिए सच की आवाज को लाठी और एफआईआर के दम पर नहीं दबा सकती। पत्रकारों ने साफ कर दिया है कि यदि यह फर्जी और एकतरफा एफआईआर तुरंत वापस नहीं ली गई और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह आंदोलन केवल बिलासपुर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में पुलिस प्रशासन के खिलाफ एक निर्णायक और उग्र जंग का रूप अख्तियार करेगा।

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