“भारत में धर्म, जाति और एकता का प्रश्न” पर 11 स्तरीय बैठक सम्पन्न — सामाजिक समरसता को बताया राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति

बिलासपुर/मुंबई।
पंडित श्रवण दुबे समुद्रशास्त्री के मार्गदर्शन में संचालित सामाजिक संस्थाओं द्वारा “भारत में धर्म, जाति और एकता का प्रश्न” विषय पर 11 स्तरीय बैठक का आयोजन किया गया, जो अमृत रसपान सत्संग के साथ सम्पन्न हुई। बैठक में देश के वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिवेश, जाति आधारित राजनीति, धर्मनिरपेक्षता के नाम पर तुष्टिकरण, आरक्षण और जाति जनगणना जैसे मुद्दों पर गंभीर मंथन किया गया।


बैठक में राष्ट्रीय प्रभारी बलदेव मल्होत्रा, वरिष्ठ पत्रकार अमर स्तंभ एवं आर.जे. रमझाझर सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी उपस्थित रहे। वक्ताओं ने कहा कि आज देश में विकास की नई दिशा दिखाई दे रही है, परंतु इसके साथ पहचान और प्रतिनिधित्व की राजनीति समाज के स्वाभाविक ताने-बाने को प्रभावित कर रही है।
पंडित श्रवण दुबे ने अपने महाराष्ट्र प्रवास का उल्लेख करते हुए कहा कि मुंबई, पुणे और नागपुर जैसे शहर औद्योगिक और शैक्षिक दृष्टि से प्रगति के प्रतीक हैं, लेकिन सामाजिक चुनौतियाँ लगभग पूरे देश में समान हैं। उन्होंने कहा कि प्राचीन वर्ण व्यवस्था मूलतः कर्मप्रधान थी, किंतु समय के साथ इसमें जटिलताएँ आईं, जिन्हें स्वीकार कर सुधार की दिशा में आगे बढ़ना ही समाधान है।
वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि वर्तमान भारत शिक्षा, तकनीक और संवाद के कारण जातीय सीमाओं से काफी आगे बढ़ चुका है और सामान्य जनजीवन में सामाजिक समरसता दिखाई देती है, परंतु चुनाव के समय विभाजन की रेखाएँ पुनः उकेरी जाती हैं। यह प्रवृत्ति राष्ट्रहित में नहीं है।
बैठक में यह भी कहा गया कि धर्म का वास्तविक स्वरूप जोड़ने का है, बाँटने का नहीं। भारत की परंपरा व्यक्तिपूजा नहीं बल्कि आदर्शों की पूजा की रही है, इसलिए किसी भी नेता या दल को विचार से ऊपर रखना लोकतांत्रिक संतुलन के लिए उचित नहीं।
वक्ताओं ने श्रीराम और श्रीकृष्ण के उदाहरण देते हुए कहा कि भारत की आस्था कभी जातीय सीमाओं में नहीं बंधी। ज्ञान जहाँ से भी मिले उसे ग्रहण करना चाहिए, न कि राजनीतिक प्रभाव में आकर उसे त्याग देना चाहिए।
कार्यक्रम का निष्कर्ष सामाजिक समरसता, पारस्परिक सम्मान और न्यायपूर्ण व्यवस्था को राष्ट्र की मजबूती का आधार बताते हुए किया गया। उपस्थितजनों ने एक स्वर में कहा कि भारत की शक्ति उसकी एकता में है और जाति, पंथ व दलगत आग्रहों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना ही समय की आवश्यकता है।

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