विशेष विश्लेषण: बजट 2026 – विकास का ‘विजुअल’ या आम आदमी के साथ बड़ा ‘छलावा’?
विशेष विश्लेषण: बजट 2026 – विकास का ‘विजुअल’ या आम आदमी के साथ बड़ा ‘छलावा’?
ब्यूरो रिपोर्ट
वित्त मंत्री द्वारा पेश किया गया बजट 2026 आंकड़ों के मायाजाल में लिपटा एक ऐसा दस्तावेज साबित हुआ है, जिसने आम जनता की उम्मीदों पर तुषारापात कर दिया है। सरकार ने एक तरफ ₹12.2 लाख करोड़ के भारी-भरकम इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च का ढिंढोरा पीटा है, तो दूसरी तरफ महंगाई की मार झेल रहे मध्यम वर्ग और कर्ज में डूबे किसान को सिर्फ ‘भविष्य के सुनहरे सपनों’ का झुनझुना पकड़ा दिया है।
1. मध्यम वर्ग: टैक्स का ‘डेड एंड’ और महंगाई का बोझ
सरकार ने इनकम टैक्स स्लैब में कोई बदलाव न करके मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी है।
दंश: जहां महंगाई दर आसमान छू रही है, वहां टैक्स छूट की सीमा न बढ़ाना जनता की जेब पर सीधा डाका है।
झुनझुना: ‘नया इनकम टैक्स एक्ट 2025’ की बात करना केवल प्रशासनिक फेरबदल है, जिससे आम आदमी की ‘टेक-होम सैलरी’ में एक रुपये का भी इजाफा नहीं होने वाला। जनता पूछ रही है कि क्या वह सिर्फ टैक्स भरने वाली मशीन बनकर रह गई है?
2. किसान: डिजिटल डेटा से नहीं, दाम से भरेगा पेट
कृषि प्रधान देश में किसानों को इस बार फिर ‘डिजिटल’ घुट्टी पिलाई गई है।
अधूरी मांग: किसान सालों से MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) की कानूनी गारंटी मांग रहे हैं, लेकिन बजट में इस पर ‘रहस्यमयी चुप्पी’ साधी गई है।
दिखावा: 6 करोड़ किसानों का डेटा डिजिटल करने से फसल की कीमत नहीं बढ़ेगी। प्राकृतिक खेती का लक्ष्य तो रखा गया, लेकिन खाद और फर्टिलाइजर सब्सिडी में की गई कटौती ने किसानों की लागत बढ़ाने का ही काम किया है। यह ‘डिजिटल इंडिया’ के नाम पर किसानों को उनके बुनियादी अधिकारों से भटकाने की साजिश लगती है।
3. महंगाई और स्वास्थ्य: आम आदमी की पहुंच से बाहर
दवाइयों का खेल: कैंसर की कुछ दवाएं सस्ती करने का श्रेय लिया जा रहा है, लेकिन रोजमर्रा की जीवन रक्षक दवाइयों और हेल्थ इंश्योरेंस पर GST कम करने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया गया है।
थाली पर वार: खाद्य सब्सिडी में कटौती का सीधा असर गरीबों की थाली पर पड़ेगा। मध्यम वर्ग के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा का खर्च इस बजट के बाद और भी बोझिल होने वाला है।
4. निवेश और रोजगार: ‘सट्टेबाजी’ के नाम पर वसूली
रिटेल निवेशकों को झटका: शेयर बाजार में अपनी किस्मत आजमा रहे युवाओं को STT (सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स) बढ़ाकर हतोत्साहित किया गया है। सरकार एक तरफ डिजिटल इकोनॉमी की बात करती है और दूसरी तरफ ट्रांजैक्शन कॉस्ट बढ़ाकर छोटे निवेशकों की कमाई में हिस्सेदारी मांग रही है।
रोजगार का अभाव: बजट में ‘पूंजीगत व्यय’ (Capex) का भारी उल्लेख है, लेकिन यह पैसा बड़े ठेकेदारों की जेब में जाएगा या धरातल पर रोजगार पैदा करेगा? पिछले बजटों के अनुभव बताते हैं कि ये बड़े आंकड़े कभी ‘जॉब मार्केट’ में तब्दील नहीं हो पाते।
निष्कर्ष: आंकड़ों की बाजीगरी, हकीकत में ‘शून्य’
यह बजट पूरी तरह से ‘कॉरपोरेट सेंट्रिक’ नजर आता है, जहां बड़े उद्योगपतियों के लिए रास्ते आसान किए गए हैं, लेकिन उस आम आदमी को भूल गया गया है जिसकी पीठ महंगाई ने पहले ही तोड़ रखी है। सरकार ने भविष्य के ‘विकसित भारत’ की ऐसी तस्वीर पेंट की है जिसमें आज का संघर्षरत नागरिक कहीं नजर नहीं आता।
