सत्ता का दिया या बदहाली का अंधियारा: पीएम मोदी के जन्मदिन पर ‘आशीर्वाद दीया’ अभियान का तीखा विश्लेषण
सत्ता का दिया या बदहाली का अंधियारा: पीएम मोदी के जन्मदिन पर ‘आशीर्वाद दीया’ अभियान का तीखा विश्लेषण

17 सितंबर यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन। इस मौके पर देश भर में ‘आशीर्वाद दीया’ जलाने का आह्वान किया गया। लेकिन, यह केवल एक स्वैच्छिक या भावनात्मक अभियान नहीं रहा, बल्कि आधिकारिक तंत्र के जरिए ऊपर से लेकर नीचे तक जारी हुए लिखित आदेशों का एक सुनियोजित प्रदर्शन बन गया। जिला प्रमुखों से लेकर ग्राम पंचायतों तक को इस आयोजन को सफल बनाने का जिम्मा सौंपा गया।
सरकारी तंत्र का दुरूपयोग और वित्तीय गैर-जिम्मेदारी
इस आयोजन की सबसे बड़ी आलोचना इसकी वित्तीय और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर हो रही है:
करोड़ों का धुआं: सूत्रों के अनुसार, देश भर में अनुमानत: 10 से 15 करोड़ दिए जलाए गए होंगे। अकेले छत्तीसगढ़ राज्य में यह आंकड़ा 50 से 70 लाख और मुंगेली जिले में लगभग 30 से 50 हजार दीपकों का हो सकता है।
सरकारी मद से खर्च: सवाल उठता है कि जब यह किसी राजनेता का निजी जन्मदिन था, तो इसे सरकारी आयोजन का रूप क्यों दिया गया? यदि यह सरकारी आयोजन था, तो इसमें इस्तेमाल हुआ तेल, दीया और बाती का पैसा किस जन-कल्याणकारी मद से निकाला गया?
आर्थिक तंगी और कर्ज का बोझ: भारत की जीडीपी विकास दर जब लक्ष्यों से काफी पीछे छूट रही है और देश की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए अंतरराष्ट्रीय बैंकों से कर्ज लिया जा रहा है, तब ऐसे आयोजनों पर करोड़ों रुपये खर्च करना कितना तर्कसंगत है?
छत्तीसगढ़ और मुंगेली का यथार्थ: खुद छत्तीसगढ़ राज्य भारी कर्ज के तले दबा हुआ है। मुंगेली जिले की स्थिति यह है कि नाम-मात्र की सड़कें बची हैं, चारों तरफ जानलेवा गड्ढे हैं और गांव बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं।
प्रतीकात्मक आयोजनों की राजनीति: ताली-थाली से लेकर ‘आशीर्वाद दीये’ तक
आलोचकों और आम जनता के एक वर्ग का मानना है कि बुनियादी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे प्रतीकात्मक आयोजनों का सहारा लिया जाता है।
पुराने फैसलों की छाप: अतीत में महामारी से निपटने के नाम पर ‘ताली और थाली’ बजवाना, भ्रष्टाचार खत्म करने के नाम पर अचानक ‘नोटबंदी’ लागू करना और फिर बैंकिंग तंत्र में नोटों की आवाजाही पर बार-बार फैसले बदलना—इन सभी आयोजनों में एक ही नीति नजर आती है: जन-आक्रोश को आस्था या राष्ट्रीयता के भाव में बदलना।
किसान आंदोलन और धार्मिक बाजारीकरण: तीन विवादित कृषि कानूनों का मामला हो या फिर देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों के आसपास बुनियादी जरूरतों के बजाय बाजारीकरण को बढ़ावा देना—नीतियों का सीधा असर आम नागरिक की जेब और जीवन पर पड़ा है।
आदेश और अनुपालन की अंधी दौड़
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक पहलू प्रशासनिक व्यवस्था का रवैया है। शीर्ष स्तर से जारी हुए आदेशों को बिना किसी वित्तीय और सामाजिक ऑडिट के जमीनी स्तर तक थोप दिया गया। स्थानीय समस्याओं जैसे जर्जर सड़कें, बेरोजगारी, और बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था को दरकिनार कर पूरी मशीनरी को दीये जलाने के प्रबंध में लगा दिया गया।
क्या इस धन का उपयोग मुंगेली की सड़कों के गड्ढे भरने, स्कूलों की व्यवस्था सुधारने या स्थानीय अस्पतालों में दवाएं उपलब्ध कराने के लिए नहीं किया जा सकता था? जब तक जनता बुनियादी सवालों पर जवाब नहीं मांगेगी, तब तक जनहित के पैसे का इसी तरह राजनीतिक आयोजनों में धुआं बनता रहेगा।
