बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ग्राम पंचायतों में भारी भवन कर (प्रॉपर्टी टैक्स) के नाम पर आम ग्रामीणों का आर्थिक शोषण बंद करे राज्य सरकार: ‘धर्म संसद (T)।

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ग्राम पंचायतों में भारी भवन कर (प्रॉपर्टी टैक्स) के नाम पर आम ग्रामीणों का आर्थिक शोषण बंद करे राज्य सरकार: ‘धर्म संसद (T)’

* ‘समर्थ पंचायत पोर्टल’ एवं ‘संपदा ऐप’ की आड़ में ₹1,200 वार्षिक कर का थोपा जाना प्रशासनिक अपारदर्शिता और तानाशाही: धर्म संसद संयोजक दिनेश दुबे
* रोजगार हेतु पलायन कर चुके ग्रामीणों के बंद पड़े मकानों पर दोहरे कराधान पर स्थिति स्पष्ट करे छत्तीसगढ़ शासन
* स्वतंत्रता के 80 वर्षों के उपरांत नीतिगत एवं सामाजिक विफलताओं पर धर्म संसद ने प्रस्तुत किया 10-बिंदु आत्ममंथन पत्र
* चुनावी चश्मे से परे हटकर जन-जागरूकता, जवाबदेही और बेहतर राजनीतिक विकल्पों के चयन का आह्वान
बिलासपुर (छत्तीसगढ़):
राज्य की ग्राम पंचायतों में संपत्तियों के डिजिटलीकरण की प्रक्रिया की आड़ में ग्रामीण परिवारों पर ₹1,200 वार्षिक (₹100 प्रतिमाह) भवन कर (प्रॉपर्टी टैक्स) अधिरोपित किए जाने के निर्णय के विरुद्ध जन-आक्रोश तेज़ हो गया है। सामाजिक व वैचारिक संगठन ‘धर्म संसद (T)’ के संयोजक दिनेश दुबे ने इसे प्रशासनिक अपारदर्शिता और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के प्रतिकूल करार देते हुए राज्य सरकार के इस कदम का कड़ा विरोध दर्ज कराया है।
बिलासपुर में जारी एक विस्तृत प्रेस वक्तव्य में धर्म संसद (T) के संयोजक दिनेश दुबे ने शासन के निर्णय, नीतिगत विरोधाभासों एवं प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर निम्नलिखित प्रमुख संवैधानिक व जनहितैषी प्रश्न उठाए हैं:
1. ग्रामीण विकास मॉडल एवं कर-रोपण की संवैधानिकता पर प्रश्न
* पलायनकर्ता आबादी पर दोहरा आर्थिक बोझ: छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों से लगभग 30% आबादी आजीविका हेतु शहरी क्षेत्रों में निवास करती है, जहाँ वे पूर्व से ही नगर निकायों को विभिन्न करों का भुगतान कर रहे हैं। ऐसे परिवारों के गांवों में स्थित बंद मकानों पर पुनः कर अधिरोपित करने का निर्णय पूर्णतः अव्यवहारिक और अन्यायपूर्ण है। धर्म संसद इस पर राज्य सरकार से अविलंब स्थिति स्पष्ट करने की मांग करती है।
* प्रशासनिक तानाशाही एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन: पंचायतों के वित्तीय सुदृढ़ीकरण हेतु कर-संग्रह की प्रक्रिया विधि-सम्मत होनी चाहिए। संपत्ति का न्यायसंगत मूल्यांकन, आपत्ति दर्ज कराने का अवसर और जन-सुनवाई का संवैधानिक प्रावधान किए बिना सीधे पंचायत कर्मचारियों के वेतन रोकने जैसी दंडात्मक कार्रवाइयों के माध्यम से कर थोपना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
* सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) की अनिवार्यता: वसूल की जाने वाली जन-राशि के पारदर्शी एवं उद्देश्यपूर्ण उपयोग हेतु प्रत्येक पाई का सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि ग्रामीण जनता को यह स्पष्ट हो सके कि उक्त राशि का उपयोग उनके क्षेत्र के विकास में किस प्रकार हो रहा है।

2. स्वतंत्रता के 80 वर्ष: धर्म संसद का 10-बिंदु आत्ममंथन पत्र
स्वतंत्रता की आठवीं दहाई के अवसर पर धर्म संसद ने देश की ऐतिहासिक उपलब्धियों और अंतरनिहित सामाजिक-नीतिगत चुनौतियों का एक निष्पक्ष संवैधानिक आकलन प्रस्तुत किया है:
| क्र. | उपलब्धियां (क्या पाया?) | राष्ट्रीय चुनौतियां (क्या खोया?) |
|—|—|—|
| 1. | लोकतांत्रिक सुदृढ़ता: औपनिवेशिक शासन से मुक्ति एवं सार्वभौमिक मताधिकार की स्थापना। | नैतिक पतन: राजनीतिक व प्रशासनिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और स्वार्थपरता। |
| 2. आर्थिक एवं तकनीकी प्रगति: वैश्विक मंच पर शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में स्थान प्राप्त करना। | सामाजिक विघटन: जातिवाद, क्षेत्रवाद और तुष्टिकरण की राजनीति द्वारा विभाजित समाज।
3. ज्ञान व शिक्षा का प्रसार: शैक्षणिक संस्थानों का विस्तार और कुशल युवा शक्ति का निर्माण। | सांस्कृतिक क्षरण: अंधाधुंध पश्चिमीकरण के कारण अपनी सांस्कृतिक एवं नैतिक जड़ों से कटाव। |
| 4. | वैज्ञानिक एवं अनुसंधानिक सफलताएं: अंतरिक्ष, परमाणु व रक्षा क्षेत्र में वैश्विक कीर्तिमान। | ग्रामीण उपेक्षा: कृषि संकट, अव्यवस्थित पलायन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बदहाली। |
| 5. | राष्ट्रीय सुरक्षा व सम्मान: वैश्विक पटल पर भारत की सुदृढ़ संप्रभुता एवं साख। | कर्तव्य बोध का अभाव: नागरिक अधिकारों की होड़ में प्राथमिक राष्ट्रीय कर्तव्यों की उपेक्षा। |
3. व्यवस्था परिवर्तन, वैचारिक क्रांति एवं राजनीतिक परिदृश्य पर चिंतन

धर्म संसद के संयोजक ने बल देकर कहा कि तात्कालिक चुनावी लाभ और लोकलुभावन वादों से देश व प्रदेश की दीर्घकालिक समस्याओं का स्थायी समाधान संभव नहीं है। अवैध घुसपैठ, नशीले पदार्थों का प्रसार और शिक्षा प्रणाली में संरचनात्मक सुधार जैसे गंभीर मुद्दों पर दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।
* मतदाता की सोच और बेहतर विकल्पों की आवश्यकता: लोकतंत्र की सफलता जागरूक और विवेकशील मतदाताओं पर निर्भर करती है। अक्सर लोग पुराने चेहरों और स्थापित समूहों को चुनते रहते हैं, जिससे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और जवाबदेही कम हो जाती है। जनता को जाति, धर्म या अंध-समर्थन के बजाय योग्यता, नीयत और कार्यक्षमता के आधार पर निष्पक्ष मूल्यांकन कर नए और बेहतर विकल्पों को अवसर देने का साहस दिखाना होगा।
* छत्तीसगढ़ का राजनीतिक परिदृश्य (चुनावी चश्मे के पार): राजनीतिक दल अक्सर चुनावी चश्मे के माध्यम से जनता के समक्ष अपनी सुविधा का दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। लोकतंत्र केवल भाषणों, नारों और पोस्टरों का नाम नहीं, बल्कि वास्तविक कार्यों और पारदर्शिता का नाम है। छत्तीसगढ़ की समृद्ध प्राकृतिक संपदा और युवा शक्ति को सुशासन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा में बदलना राजनीति का प्राथमिक दायित्व होना चाहिए।
जन-जागरण का संकल्प एवं अपील
धर्म संसद ने यह स्पष्ट किया है कि भावी पीढ़ी को एक सुरक्षित, संस्कारयुक्त, भ्रष्टाचार-मुक्त और आत्मनिर्भर भारत सौंपने के लिए केवल सत्ता परिवर्तन पर्याप्त नहीं है, बल्कि ‘सोच परिवर्तन’ और ‘नागरिक कर्तव्य-बोध’ परम आवश्यक है।
धर्म संसद ने समस्त प्रबुद्ध नागरिकों, बुद्धिजीवियों और युवाओं से राष्ट्र निर्माण, समसामयिक विषयों पर गंभीर चिंतन एवं वैचारिक क्रांति से जुड़ने का आह्वान किया है। संगठन के आधिकारिक जन-संपर्क माध्यम (+91 9300310671) से जुड़कर इस लोक-कल्याणकारी संदेश को व्यापक जन-जन तक पहुँचाने की अपील की गई है।
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