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बलौदा बाजार वन संरक्षण पर सवाल?? डीएफओ जंगल बचाने मे हुए विफल।

रेंजर की स्वीकारोक्ति के बाद वन विभाग कठघरे में, अवैध कटाई पर कार्रवाई कब?

बलौदा बाजार वन संरक्षण पर सवाल?? डीएफओ जंगल बचाने मे हुए विफल

 

एक ओर बलौदाबाजार वनमंडल द्वारा जिले में वन संरक्षण, वृक्षारोपण, जनजागरूकता अभियान और पर्यावरण संवर्धन को लेकर लगातार विभिन्न कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। विभाग अपनी उपलब्धियों और पहलों को प्रमुखता से प्रचारित भी कर रहा है, लेकिन मुड़ियाडीह-धमनी जंगल क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हुई सागौन वृक्षों की अवैध कटाई ने इन दावों की वास्तविकता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। जंगल के भीतर बड़ी संख्या में कटे हुए सागौन के ठूंठ और प्रभावित क्षेत्र यह संकेत दे रहे हैं कि वन विभाग अपने मूल दायित्व अर्थात जंगलों की सुरक्षा और वन संपदा के संरक्षण में अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखा पा रहा है। स्थानीय सूत्रों का कहना है कि कई ठूंठों में उगे पौधे और विकसित हो चुके वृक्ष यह दर्शाते हैं कि अवैध कटाई का सिलसिला केवल हाल का नहीं बल्कि कई महीनों से लगातार जारी है। रेंजर एकता कर ने अपनी प्राथमिक जाँच मे इस बात की पुष्टि भी की है कई बहुत सारे पेड़ पिछले 7-8 महीनों पहले काटें गए है। जबकि ऐसा कहकर वे अपने आप को मामले अलग रखना चाह रही है क्योंकि ऐसा बताने के पीछे कारण यह है कि वे बलौदाबाजार वन परिक्षेत्र मे पदभार लिए करीब दो माह हुए हैजिससे वे इस लापरवाही से बचा जा सके।इस बात से एकदम साफ है कि रेंजर स्वयं स्वीकार रही है कि सैगोन की अवैध हुई है लेकिन विभाग को प्राप्त वीडियो मे स्पष्ट देखा जा सकता है कि अधिकांश सैगोन कि कटाई हाल ही है ऐसे वन अधिनियम यदि ऐसा है तो यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि आखिर इतने लंबे समय तक विभागीय अमले को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई। जबकि जिला वनमंडलाधिकारी द्वारा भी बीते महीनों में धमनी क्षेत्र का कई बार दौरा किया गया था।

*सोनाखान के बिलारी से लेकर धमनी तक, क्या हर मामले में हो रही लीपापोती?*

मुड़ियाडीह-धमनी जंगल में सामने आई स्थिति ने विभागीय निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि यदि इतने बड़े स्तर पर सागौन के वृक्षों की कटाई हुई है तो या तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों को इसकी जानकारी नहीं थी या फिर जानकारी होने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। इससे पहले सोनाखान क्षेत्र में भी सागौन की अवैध कटाई को लेकर चर्चाएं हुई थीं, लेकिन आरोप है कि मामले को दबा दिया गया। ऐसे में अब लोगों के बीच यह धारणा बन रही है कि जिले के कई वन क्षेत्रों में इसी प्रकार की अनियमितताएं लंबे समय से जारी हैं। कुछ मामलों का खुलासा हो जाता है, जबकि कई मामलों को दबाने और छिपाने का प्रयास किया जाता है। वन क्षेत्र केवल लकड़ी का स्रोत नहीं बल्कि पर्यावरणीय संतुलन, जैव विविधता और वन्यजीवों का आधार हैं, इसलिए इस प्रकार की घटनाएं केवल विभागीय लापरवाही नहीं बल्कि पर्यावरणीय क्षति का भी गंभीर विषय हैं।

*बीट गार्ड की कार्यशैली पर सवाल, कार्रवाई की मांग तेज*

सागौन देश की सबसे मूल्यवान इमारती लकड़ियों में से एक है और इसकी कटाई को लेकर नियम अत्यंत सख्त हैं। निजी भूमि पर लगे सागौन के वृक्ष को काटने के लिए भी वन विभाग एवं अनुविभागीय अधिकारी (रा)की अनुमति आवश्यक होती है, लेकिन संरक्षित जंगलों में बड़ी संख्या में सागौन के वृक्ष कट जाने के बाद भी कार्रवाई का अभाव कई सवाल खड़े कर रहा है। इसी बीच सूत्रों के हवाले से जानकारी सामने आई है कि संबंधित बीट का बीट गार्ड स्वयं को शेयर मार्केट एवं क्रिप्टो करेंसी के जानकर मानता है।जबकि राज्य सरकार द्वारा शासकीय कर्मचारी को शेयर मार्केटिंग एवं अन्य गतिविधि पर रोक लगाते हुए आदेश जारी किया गया कि किसी भी विभाग के कर्मचारी द्वारा क्रिप्टो करेंसी जैसे मामलो से न जुड़े एवं इस प्रकार मामले मे संदिग्ध पाए जाने पर अनुशासत्मक कार्यवाही की जाएगी।स्थानीय लोगों का आरोप है कि जंगलों और वन्यजीवों की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने के बजाय उसकी प्राथमिकताएं अन्य गतिविधियों पर अधिक केंद्रित दिखाई देती हैं। साथ ही यह भी चर्चा है कि संबंधित कर्मचारी अपने संगठन में प्रभावशाली पद पर होने के कारण उसके विरुद्ध कार्रवाई करने में अधिकारी भी संकोच कर रहे हैं। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। बहरहाल, क्षेत्र के लोगों की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाए, ताकि वन संपदा की सुरक्षा को लेकर जनता का विश्वास कायम रह सके।

 

*जानिए वन अधिनियम क्या कहता है *

वन अधिनियम और सरकारी सेवा के नियमों के तहत, यदि किसी जांच में यह साबित हो जाता है कि वन कर्मचारी की मिलीभगत या लापरवाही से पेड़ों की अवैध कटाई हुई है, तो काटे गए पेड़ों के नुकसान की भरपाई (वसूली) उस तादात के अनुरूप वन रक्षक से लेकर वनमंडलाअधिकारी की जाती है।तो क्या ऐसी मे रेंजर से लेकर डीएफओ क्या स्वम पर आरोप लगाना चाहेगा। मतलब साफ है कुछ पेड़ो की कटाई दिखाकर वनरक्षक को छोटी मोटी राशि का जुर्माना लगाकर मामले को रफादफा कर अपने आप को बचाने के लिए पूरा जांच तंत्र सेट किया जाता है। अगर वन अमला जांच को पारदर्शी और ईमानदारी से करना चाह रहा है तो फिर जांच मे शिकायतकर्ता को शामिल कर शिकायतकर्ता के समक्ष जांच करे। अगर ऐसा किया जाता है तब माना जायेगा कि विभाग पूरी निष्ठा के साथ अपने विभाग को संचालित कर रही है नहीं तो फिर पूरा विभाग खानापूर्ति की दुकान चला रहा है।

संबंधित नियम और प्रावधान:भारतीय वन अधिनियम, 1927 : इस अधिनियम की धारा 66 के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई वन अधिकारी (जो वन अपराध रोकने के लिए कर्तव्यबद्ध हो) जानबूझकर किसी वन अपराध की उपेक्षा करते हैं, तो उन्हें दंडित किया जाता है। यदि वे अवैध कटाई में लिप्त पाए जाते हैं, तो उन पर आपराधिक मुकदमा भी चलाया जा सकता है।
वित्तीय नियम सरकारी कर्मचारी आचरण नियमों और वित्तीय संहिताओं के अंतर्गत, यदि कोई कर्मचारी सरकारी संपत्ति (वन संपदा) को नुकसान पहुँचाता है या उसे नष्ट होने देता है, तो विभाग को उस नुकसान के आर्थिक मूल्य (क्षतिपूर्ति) की वसूली सीधे उस कर्मचारी के वेतन या पेंशन से करने का पूरा अधिकार होता है।नुकसान की भरपाई के अलावा, ऐसे दोषी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय जांच की जाती है, साथ ही यह सिद्ध हो जाती है साथ ही साथ इसके अलावा निलंबन, वेतन वृद्धि रोकना या सेवा से बर्खास्तगी तक की बड़ी कार्रवाई हो सकती है।

*क्या कहते है जिम्मेदार:-*

जाँच के लिए आदेश दे दिया हूँ। दोषियों को बक्शा नहीं जायेगा

*गणवीर धम्मशील, डीएफओ बलौदाबाजार*

मैं जाँच मे गई थी, बहुत सारे पेड़ 7-8 महीने पहले के कटे है।

*दो अलग अलग स्तर पर जाँच जारी है
एकता कर, रेंजर वन परिक्षेत्र बलौदाबाजार*

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