धान के कटोरे’ में सुलगती व्यवस्था की राख; मुंगेली के अन्नदाता की रूह को छलनी करता जिला प्रशासन और सहकारी बैंक का ‘भ्रष्टाचार-तंत्र’!

धान के कटोरे’ में सुलगती व्यवस्था की राख; मुंगेली के अन्नदाता की रूह को छलनी करता जिला प्रशासन और सहकारी बैंक का ‘भ्रष्टाचार-तंत्र’!

 

मुंगेली से वार्षिक बंजारा की रिपोर्ट

​मुंगेली। छत्तीसगढ़ की माटी जिसे हम ‘धान का कटोरा’ कहकर गर्व से सीना चौड़ा करते हैं, आज उसी माटी के लाल यानी किसान की आंखों में खून के आंसू हैं। मुंगेली जिले में प्रशासन की ‘वाहवाही’ और जमीन पर रेंगती ‘तबाही’ के बीच का फासला इतना बढ़ गया है कि किसान अब खुद को इस लोकतंत्र का नागरिक नहीं, बल्कि व्यवस्था का बंधुआ मजदूर समझने लगा है। फसल उगाने से लेकर फसल बेचने और फिर अपना ही पैसा पाने तक, मुंगेली का किसान हर कदम पर सरकारी और प्रशासनिक ‘अंकुश’ की मार झेल रहा है।

​१. बैंक की चौखट पर नीलाम होती अस्मिता: ‘सुविधा शुल्क’ बनाम ‘गरीब की धूप’

​मुंगेली स्थित जिला सहकारी बैंक आज बैंक नहीं, बल्कि किसानों के शोषण का केंद्र बन चुका है। जो पैसा किसान के पसीने की कमाई है, उसे निकालने के लिए उसे किसी अपराधी की तरह लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है। ‘ग्राम वाइज’ भुगतान की कागजी व्यवस्था दम तोड़ चुकी है। आरोप है कि बैंक प्रबंधन की मिलीभगत से ‘एक्स्ट्रा पैसा’ (कमीशन) देने वालों की तिजोरियां तुरंत खुल जाती हैं, जबकि ईमानदार किसान को “कैश खत्म हो गया” का झुनझुना थमाकर धूप में जलने के लिए छोड़ दिया जाता है। डिजिटल इंडिया के नाम पर दिए गए एटीएम महज ‘प्लास्टिक के टुकड़े’ साबित हो रहे हैं, क्योंकि न तो इनका नेटवर्क है और न ही रखरखाव।

​२. बिजली का ‘करंट’ और बिलों का ‘शॉक’: अंधेरे में डूबा किसान

​प्रशासन एक तरफ बिजली बिलों में बेतहाशा बढ़ोतरी कर रहा है, तो दूसरी तरफ ग्रामीण क्षेत्रों में अघोषित बिजली कटौती ने किसानों की कमर तोड़ दी है। जब धान की फसल को पानी की सख्त जरूरत थी, तब बिजली गायब रही। ट्रांसफार्मर जलने पर महीनों चक्कर काटने पड़ते हैं, लेकिन सुधार के नाम पर केवल आश्वासन मिलता है। यह कैसी व्यवस्था है जहाँ बिल ‘सुपरफास्ट’ आता है और बिजली ‘पैसेंजर’ की तरह रुक-रुक कर?

​३. खाद की कालाबाजारी और कागजी अंकुश का प्रहार

​यूरिया और डीएपी जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए किसानों को दर-दर भटकने पर मजबूर किया गया। मार्केट से खाद गायब कर दी गई ताकि ऊंचे दामों पर कालाबाजारी की जा सके। प्रशासन ने इन कालाबाजारियों पर अंकुश लगाने के बजाय किसानों के रकबे और धान खरीदी की प्रक्रिया पर ‘नाना प्रकार के अंकुश’ लगाए, जिससे कई किसान अपनी उपज बेच ही नहीं सके।

​४. गर्मी धान पर ‘प्रतिबंध’ की तानाशाही: बोर खनन पर रोक और प्रशासनिक वाहवाही

​अब जब किसान गर्मी धान की तैयारी करना चाहता है, तो प्रशासन ने बोर खनन पर प्रतिबंध लगाकर उसके हाथ बांध दिए हैं। बिजली की समस्या दिन दुगुनी-रात चौगुनी बढ़ रही है, लेकिन समाधान के बजाय केवल ‘प्रतिबंध’ का सहारा लिया जा रहा है। जिला प्रशासन हर क्षेत्र में अंकुश लगाने का ढोंग कर रहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह अंकुश केवल किसानों की तरक्की और उनकी आजीविका पर है।

​५. नाक रगड़ता किसान और जश्न मनाता प्रशासन

​विडंबना देखिए, अपनी ही फसल का पैसा पाने के लिए किसान बैंकों की दहलीज पर ‘नाक रगड़’ रहा है और दूसरी तरफ जिला प्रशासन विकास के खोखले आंकड़े पेश कर ‘वाहवाही’ बटोरने में मशगूल है। सरकार की नीतियां कागजों पर तो ‘किसान-हितैषी’ दिखती हैं, लेकिन मुंगेली की जमीन पर वे ‘किसान-विरोधी’ साबित हो रही हैं।

​सम्पादकीय टिप्पणी: क्या प्रशासन को यह मुगालता है कि किसान की चुप्पी उसकी कमजोरी है? याद रहे, जिस अन्नदाता ने खलिहान भरे हैं, वह अपनी हकमारी के खिलाफ सड़कों को भी भरना जानता है। मुंगेली के जिला सहकारी बैंक और जिला प्रशासन का यह ‘गठबंधन’ किसानों के सब्र का इम्तिहान ले रहा है, जो किसी भी दिन बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है।

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