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घोटाले पर पर्दा डालने का पैंतरा: 35 लाख के गबन की शिकायत होते ही ‘अधिकारी बचाओ सिंडिकेट’ सक्रिय, उल्टे सवाल उठाने वाले पत्रकारों पर कार्रवाई की मांग!

घोटाले पर पर्दा डालने का पैंतरा: 35 लाख के गबन की शिकायत होते ही ‘अधिकारी बचाओ सिंडिकेट’ सक्रिय, उल्टे सवाल उठाने वाले पत्रकारों पर कार्रवाई की मांग!

​विशेष विश्लेषणात्मक रिपोर्ट (मुंगेली):

मुंगेली में स्वतंत्रता दिवस के नाम पर विभागों से हुई 32 से 35 लाख रुपये की अवैध उगाही का मामला सामने आते ही प्रशासनिक और मीडिया हलकों में जबर्दस्त खलबली मच गई है। एक तरफ जहां भ्रष्टाचार के खिलाफ निष्पक्ष जांच की मांग हो रही है, वहीं दूसरी तरफ अधिकारियों की ‘गुड बुक्स’ में शामिल और संरक्षण प्राप्त तथाकथित पत्रकारों का सिंडिकेट खुलकर अफसरों की ढाल बनने मैदान में उतर आया है।

​अवैध वसूली का सच उजागर होने के तुरंत बाद मुंगेली प्रेस क्लब के बैनर तले एडीएम निष्ठा पांडेय तिवारी और एडिशनल एसपी प्रशांत शुक्ला को तीन अलग-अलग ज्ञापन सौंपे गए। हैरत की बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम में 35 लाख के वित्तीय गबन की जांच कराने के बजाय, उल्टे सवाल उठाने वाले पत्रकारों की योग्यता, सत्यापन और पुलिस जांच कराने की मांग की जा रही है।

​अधिकारियों की वफादारी में ज्ञापन का खेल: 4 बड़े पहलू

​भ्रष्टाचार से ध्यान भटकाने की रणनीति: जब-जब बड़े अधिकारियों की कार्यशैली और वित्तीय गबन पर पर्दा उठाने का प्रयास होता है, तब-तब इस प्रकार के ‘काउंटर अटैक’ की पटकथा रची जाती है। 35 लाख रुपये कहां गए—इस मूल सवाल का जवाब देने के बजाय ज्ञापन सौंपकर पुलिस सत्यापन और योग्यता के नियम गिनाए जा रहे हैं।

​डिजिटल और स्वतंत्र पत्रकारों को निशाना: ज्ञापन में डिजिटल मीडिया और नए दौर के पत्रकारों को “अवैध गतिविधियां”, “ब्लैकमेलिंग” और “आधारहीन सवाल” करने वाला बताकर उनकी घेराबंदी की कोशिश की जा रही है। सवाल यह उठता है कि क्या अफसरों से भ्रष्टाचार पर तीखे सवाल पूछना अब ‘ब्लैकमेलिंग’ की श्रेणी में आता है?

​’गुड बुक्स’ वाली सूची बचाने की छटपटाहट: जनसंपर्क विभाग (PRO) की सूची के पुनरीक्षण की मांग के पीछे का असली खेल यही है कि जो भी पत्रकार अफसरों की हां में हां न मिलाए, उसे इस सूची से बाहर का रास्ता दिखाया जा सके।

​अधिकारियों को क्लीन चिट देने की होड़: ज्ञापन में अधिकारियों की “छवि धूमिल होने” की चिंता तो जताई गई, लेकिन विभिन्न विभागों से उगाहे गए लाखों रुपये के लिफाफों पर पूरी तरह चुप्पी साध ली गई।

​सवाल जो मुंगेली का तंत्र छिपाना चाहता है:

​मूल मुद्दे से ध्यान क्यों भटकाया जा रहा है? यदि 35 लाख रुपये की वसूली का दावा झूठा है, तो प्रेस क्लब ने ACB या EOW जांच का समर्थन करने के बजाय सवाल उठाने वालों पर ही कार्रवाई की मांग क्यों की?

 

​पुलिस सत्यापन की याद अब ही क्यों आई? सालों से चल रही व्यवस्था में पुलिस वेरिफिकेशन का मुद्दा ठीक उसी दिन क्यों उठा, जब स्वतंत्रता दिवस घोटाले की शिकायत मुख्यमंत्री हेल्पलाइन (WP260900176043) तक पहुंची?

​क्या सच दिखाना ‘ब्लैकमेलिंग’ है? जो अधिकारी ट्रांसफर के बाद निकल जाते हैं, उनके कारनामों पर जब निष्पक्ष पत्रकार सच लिखते हैं, तो उसे “आधारहीन आरोप” बताकर दबाने का प्रयास क्यों किया जा रहा है?

​चौथे स्तंभ की निष्पक्षता का तकाजा यही है कि भ्रष्टाचार चाहे किसी नेता का हो, अधिकारी का हो या किसी संस्था का—जांच निष्पक्ष होनी चाहिए। अधिकारियों की चापलूसी में डूबे गिरोह की इस बौखलाहट ने यह साबित कर दिया है कि 35 लाख की वसूली का तीर बिल्कुल सही निशाने पर लगा है।

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