बिलासपुर: जीत के उत्साह और ‘नेहरू चौक के हड़ताल के बीच, कांग्रेस को तलाशनी होगी अपनी असली पतवार।
बिलासपुर: जीत के उत्साह और ‘नेहरू चौक के हड़ताल’ के बीच, कांग्रेस को तलाशनी होगी अपनी असली पतवार
बिलासपुर। बिलासपुर नगर निगम उपचुनाव में तारबहार की सम्मानित जनता ने दिवंगत नेता स्वर्गीय शेख गफ्फार जी के प्रति अपनी गहरी आस्था प्रकट करते हुए कांग्रेस की झोली में जीत डाल दी। सन्नी भाई और कांग्रेस संगठन के लिए यह जीत निश्चित रूप से एक संजीवनी की तरह है, जिसने कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार किया है।
परंतु, इस बड़ी सफलता के ठीक अगले ही दिन नेहरू चौक पर जो नजारा देखने को मिला—जहाँ विरोध प्रदर्शन के नाम पर बस के ऊपर चढ़कर भाषणबाज़ी हुई और देवेंद्र यादव सहित अन्य नेताओं के कुर्ते फटने तक की नौबत आ गई—उसने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। आज जब कांग्रेस पहले से ही विपक्ष में है और संघर्ष के दौर से गुजर रही है, तब जीत के ठीक बाद ऐसा अनियंत्रित प्रदर्शन यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या पार्टी वाकई सही दिशा में आगे बढ़ रही है?
रील और रीयल के भंवर में फंसी पार्टी
एक निष्पक्ष राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर यदि कल के घटनाक्रम को देखा जाए, तो यह साफ है कि कांग्रेस इस समय एक अजीब आंतरिक भंवर में फंसी हुई है। नेहरू चौक का प्रदर्शन जनता के मुद्दों पर केंद्रित होने के बजाय ‘फिल्मी शूटिंग’ जैसा अधिक प्रतीत होने लगा, जहाँ गंभीरता गायब थी और कैमरों के लिए किया गया ‘हाई-ड्रामा’ हावी था।
जब दल पहले से ही सत्ता से बाहर हो, तो जनता ऐसे नेताओं को देखना चाहती है जो सड़क पर उनके हक की गंभीर लड़ाई लड़ें, न कि आत्मघाती अंदाज में अपने ही कुर्ते फाड़कर अनुशासनहीनता का प्रदर्शन करें। यह स्थिति किसी बाहरी विरोधी ने पैदा नहीं की है, बल्कि कांग्रेस के अपने ही तौर-तरीके उसकी इस कमजोर हालत के जिम्मेदार बन रहे हैं।
डूबती नैया और ‘पतवार’ की तलाश
आज कांग्रेस के लिए यह समय केवल जश्न मनाने या सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन के नाम पर तमाशा करने का नहीं है। विपक्ष में रहते हुए अगर पार्टी को अपनी डूबती साख को बचाना है, तो उसे एक मजबूत ‘पतवार’ की जरूरत है। वह पतवार किसी ड्रामे से नहीं, बल्कि इन तीन बुनियादी सुधारों से मिलेगी:
कैमरे की राजनीति से दूरी: नेताओं को सोशल मीडिया की ‘रील’ और हेडलाइंस बटोरने वाली ‘कुर्ताफाड़ राजनीति’ से बाहर निकलकर, जमीन पर ठोस और गंभीर काम करना होगा।
संगठनात्मक अनुशासन: जीत को बरकरार रखना है, तो पार्टी को अपने भीतर के बिखराव और गुटबाजी को कड़ाई से थामना होगा। जब तक आंतरिक अनुशासन मजबूत नहीं होगा, जनता का भरोसा जीतना नामुमकिन है।
जनता के विश्वास का सम्मान: तारबहार की जनता ने स्वर्गीय शेख गफ्फार जी के काम और साख पर भरोसा जताया है। कांग्रेस को यह समझना होगा कि जनता का यह भरोसा बेहद कीमती है, इसे सड़कों पर तमाशा बनाकर गंवाया नहीं जा सकता।
निष्कर्ष: अब भी संभलने का मौका
बिलासपुर उपचुनाव के नतीजों ने साबित कर दिया है कि जनता आज भी कांग्रेस को विकल्प के रूप में देखने को तैयार है, बशर्ते पार्टी खुद को गंभीर बनाए। नेहरू चौक पर जो हुआ, वह कांग्रेस की अपनी गलतियों का एक मौन तमाचा था, जिसे सुधारना संगठन के हित में है। अगर कांग्रेस इस जीत के संदेश को समझे और ‘थिएटर’ छोड़कर गंभीरता की पतवार थाम ले, तो वह इस विपरीत परिस्थिति से उबर सकती है। वरना, अपनी ही वजह से बिगड़ते हालात पार्टी को और गहरे संकट में डाल देंगे।

