विशेष आलेख: घर की नींव और पुरुष का स्वाभिमान
विशेष आलेख: घर की नींव और पुरुष का स्वाभिमान
विवाह केवल बंधन नहीं, मर्यादा और त्याग की पराकाष्ठा है
लेखक: पंडित श्रवण दुबे ‘समुद्र शास्त्री’
(प्रमुख, जन कल्याण पुनर्वास केंद्र मीडिया हाउस)
आज के उपभोक्तावादी दौर में मानवीय रिश्तों को अक्सर ‘जरूरतों’ के चश्मे से देखा जाता है। समाज में एक भ्रामक धारणा घर कर गई है कि पुरुष का विवाह की ओर झुकाव केवल सतही आकर्षण तक सीमित है। किंतु यदि हम भारतीय संस्कृति और पुरुष मनोविज्ञान की गहराई में उतरें, तो सत्य इसके सर्वथा भिन्न है। विवाह की वेदी पर पुरुष केवल एक साथी नहीं चुनता, बल्कि वह अपने संपूर्ण अस्तित्व और भविष्य का समर्पण करता है।
बाजार नहीं, ‘बसेरा’ बसाने की चाह
अक्सर लोग अर्थशास्त्र की भाषा में बात करते हैं, लेकिन रिश्तों का गणित भावना से चलता है। यदि पुरुष का ध्येय केवल क्षणिक सुख होता, तो वह अपने जीवन भर की जमापूंजी, कठिन परिश्रम से अर्जित धन और सामाजिक प्रतिष्ठा को एक विवाह संस्कार में समर्पित नहीं करता।
निवेश विरासत में: एक पुरुष लाखों रुपए और बरसों का समय इसलिए लगाता है क्योंकि वह ‘क्षणभंगुर’ नहीं, ‘शाश्वत’ चाहता है।
कुल की मर्यादा: वह अग्नि के फेरे लेकर एक कुल, एक नाम और एक छत का निर्माण करता है। वह अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित भविष्य की नींव रखता है।
पुरुष की वास्तविक भूख: सम्मान और संबल
दिन भर तपती धूप में पसीना बहाने और बाहर की दुनिया की कड़वाहट झेलने के बाद, जब एक पुरुष घर की दहलीज पर कदम रखता है, तो उसे केवल भोजन की तलाश नहीं होती। उसकी आत्मा तीन चीजों के लिए लालायित रहती है:
सम्मान (Respect): जहाँ उसे यह महसूस हो कि उसके संघर्ष की कीमत है।
भावनात्मक छांव: एक ऐसा कोना जहाँ वह अपनी थकान और चिंताएं साझा कर सके।
निष्ठा (Loyalty): यह विश्वास कि संसार के हर मोड़ पर कोई उसके साथ अडिग खड़ा है।
”जब पुरुष को घर में सम्मान और प्रेम मिलता है, तो वह शिव की भांति विष पीकर भी अपने परिवार के लिए अमृत बरसाने की क्षमता रखता है।”
गलत चुनाव और बिखरते सपने
विवाह का समीकरण तब बिगड़ता है जब भावनाओं के इस लेन-देन में संतुलन खत्म हो जाता है। यदि जीवनसंगिनी इन सूक्ष्म भावनाओं के मूल्य को नहीं समझती, तो परिणाम केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक पतन के रूप में सामने आते हैं:
ऊर्जा का ह्रास: जो समय उन्नति और सृजन में लगना चाहिए था, वह गृह-क्लेश और मानसिक द्वंद्व में व्यर्थ हो जाता है।
प्रतिष्ठा पर आंच: वर्षों की मेहनत से कमाई गई सामाजिक साख पल भर में धुंधली पड़ जाती है।
सपनों का ढहना: प्रेम की नींव पर बना सपनों का महल उपेक्षा की भेंट चढ़ जाता है।
निष्कर्ष: प्रेम ही परम आधार है
विवाह के मंडप में पुरुष अपनी ‘स्वतंत्रता’ का दान देकर ‘उत्तरदायित्व’ का वरण करता है। यह संसार का सबसे मौन लेकिन सबसे बड़ा त्याग है। समुद्र शास्त्री का मत स्पष्ट है—विवाह शरीर का नहीं, संस्कारों का संगम है। इसकी गरिमा तभी सुरक्षित है जब हम पुरुष को केवल एक ‘कमाने वाली मशीन’ (Provider) न समझकर एक भावुक मनुष्य समझें।
संदेश: एक सुखी परिवार वही है जहाँ पुरुष के पसीने का सम्मान हो और स्त्री के समर्पण की कद्र। जहाँ ‘जिस्म’ से ऊपर उठकर ‘जज्बात’ को प्रधानता दी जाए, वहीं स्वर्ग का वास होता है।
