चिराग तले अंधेरा: आखिरकार ग्रामीण क्षेत्रों की बिजली काटकर क्या सिद्ध कर रहा है छत्तीसगढ़ का बिजली विभाग?
24 घंटे में महज 12 घंटे आपूर्ति, 3-फेज़ का छलावा और ठेकेदारी प्रथा का ज़हर; शहर से 5 किमी दूर पीपरपारा पालचुवा में महीने भर से छाया है सन्नाटा
विशेष रिपोर्ट
छत्तीसगढ़: “सरप्लस बिजली राज्य” का दावा करने वाले छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में बिजली व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। यक्ष प्रश्न यह उठ रहा है कि आखिरकार छत्तीसगढ़ का बिजली विभाग ग्रामीण क्षेत्रों की बिजली काटकर क्या हासिल करना चाहता है? क्या गाँवों में उजाला देना विभाग की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है? अघोषित बिजली कटौती का आलम यह है कि 24 घंटे में मुश्किल से 12 घंटे ही बिजली मिल पा रही है, और वह भी हर आधे-एक घंटे में गोल कर दी जाती है। ना खेती-किसानी के लिए पानी मिल पा रहा है और ना ही ग्रामीणों की दिनचर्या सुचारू रूप से चल पा रही है।
एकल बत्ती का छलावा: खंभे गड़े, तार बिछे… पर ना मीटर लगा ना कनेक्शन!
विभाग की कारगुज़ारियों और भ्रष्टाचार की पोल खोलने के लिए एकल बत्ती कनेक्शन योजना का उदाहरण ही काफी है। योजना के तहत गाँव-गाँव में महीनों पहले पोल (खंभे) गाड़ दिए गए और तार भी बिछा दिए गए, लेकिन महीने बीत जाने के बाद भी ना तो किसी गरीब के घर में बिजली का कनेक्शन जोड़ा गया और ना ही मीटर लगाए गए।
लापरवाही की इंतहा देखिए—गुणवत्ताहीन कार्य के कारण पहली बारिश के बाद कई जगहों पर गड़े हुए खंभे तक धराशायी हो गए। सरकारी खजाने की बर्बादी और ग्रामीणों के साथ यह छलावा बिजली विभाग की बदहाली की दास्तान खुद बयां कर रहा है।
3-Phase का ढोंग और धू-धू कर जलते ट्रांसफॉर्मर
गाँव में किसानों और ग्रामीणों का जीवन पूरी तरह ट्यूबवेल पर निर्भर होता है, जिसके लिए निर्बाध थ्री-फेज़ (3-Phase) बिजली की आवश्यकता होती है। परंतु, विभाग हमेशा अलग-अलग फेज़ पर करंट देकर ट्रांसफॉर्मर की लोड क्षमता को अनियंत्रित रूप से बढ़ा देता है।
परिणाम स्वरूप:
किसानों के बोरवेल और पंप नहीं चल पा रहे हैं।
आए दिन ट्रांसफॉर्मर के देव (Drop Fuse) कट रहे हैं।
बस (Boost) कटने और क्षमता से अधिक दबाव के कारण केबल व तार जल रहे हैं।
ठेकेदारी प्रथा का ज़हर: शिकायतों पर कुंडली मारकर बैठा विभाग
जब से बिजली विभाग और उसके कर्मचारियों के कामकाज को ठेकेदारी प्रथा के अंतर्गत लाया गया है, तब से आम ग्रामीणों की शिकायतों का कोई मूल्य नहीं रह गया है। गाँव में देव कटने या तारों के जलने जैसी गंभीर समस्याओं के बावजूद ठेकेदार या विभागीय कर्मचारी मौके पर नहीं पहुंचते। विवश होकर ग्रामीण आपसी सहमति और चंदे से खुद ही जान जोखिम में डालकर ट्रांसफॉर्मर और बिजली का काम करते नजर आते हैं।
पीपरपारा पालचुवा में महीने भर से अंधेरा: नेता की मर्जी बिना नहीं बदलता ट्रांसफॉर्मर!
शहर से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर बसे गाँव पीपरपारा पालचुवा की स्थिति बेहद गंभीर है। यहाँ पिछले महीने भर से ट्रांसफॉर्मर जला हुआ पड़ा है। दिन ढलते ही पूरे गाँव में अंधेरा छा जाता है। हेल्पलाइन नंबरों पर शिकायत करने के बाद भी कोई जवाब या समाधान की दिशा में पहल नहीं हो रही है।
ग्रामीणों के बीच अब यह कड़वी सच्चाई बैठ चुकी है कि बिजली विभाग बिना स्थानीय विधायक या सांसद के अनुमोदन (अनुशंसा) के एक कदम भी नहीं हिलाता। यही वजह है कि जब भी गाँव में ट्रांसफॉर्मर जलता है या कोई बड़ा संकट आता है, तो गरीब ग्रामीणों को अपने काम-धंधे छोड़कर जनप्रतिनिधियों और नेताओं के चौखट पर शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
सवाल जो जवाब मांगते हैं:
महीनों पहले बिछाए गए तारों और खंभों पर अब तक कनेक्शन और मीटर क्यों नहीं लगाए गए?
पहली ही बारिश में गिरे खंभों के घटिया निर्माण का जिम्मेदार कौन है?
क्या जल चुके ट्रांसफॉर्मर को बदलने के लिए हर बार ग्रामीणों का विधायक-सांसद के चक्कर काटना ही एकमात्र व्यवस्था रह गई है?
यदि बिजली विभाग ने पीपरपारा पालचुवा सहित अन्य प्रभावित गाँवों की समस्याओं का तत्काल निराकरण नहीं किया और ठेकेदारों की जवाबदेही तय नहीं की, तो आक्रोशित ग्रामीण उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।
