त्यौहार की आड़ में सरेआम गुंडागर्दी: आस्था के नाम पर जबरन वसूली और हुड़दंग कब तक?

त्यौहार की आड़ में सरेआम गुंडागर्दी: आस्था के नाम पर जबरन वसूली और हुड़दंग कब तक?

​गणेश चतुर्थी और नवरात्रि जैसे पावन पर्व करीब आते ही गलियों, चौराहों और कस्बों में उत्सव की तैयारी शुरू हो जाती है। लेकिन इस धार्मिक उत्साह का एक ऐसा काला सच भी है, जिसने भक्ति की मूल भावना को ही तार-तार कर दिया है। पिछले कुछ वर्षों में त्यौहारों के नाम पर सड़क रोककर चंदा वसूलना, आधी रात को हुड़दंग मचाना और आम नागरिकों का जीना मुहाल करना एक डरावनी परंपरा बनता जा रहा है।

​धर्म का संदेश सेवा, संयम और अनुशासन सिखाता है, लेकिन आज इसकी आड़ में ‘दबंगई की नई पौध’ तैयार हो रही है।

​धर्म के नाम पर ‘टोल टैक्स’ और सरेआम दादागिरी

​त्यौहारों के आते ही गांव-शहर की तंग गलियों से लेकर मुख्य सड़कों तक, बच्चों और युवाओं की टोलियां लाठी-डंडे या बैरिकेड लगाकर खड़ी हो जाती हैं। आम राहगीरों को रोककर जिस तरह से पैसे मांगे जाते हैं, वह ‘दान’ नहीं बल्कि ‘जबरन वसूली’ है।

​स्वेच्छा बनाम दबाव: यदि कोई व्यक्ति अपनी श्रद्धा से 11 या 51 रुपये देना चाहे, तो उसे जलील किया जाता है। तय रकम न देने पर राहगीरों के साथ गाली-गलौज, हाथापाई और मारपीट तक की नौबत आ जाती है।

​कानून का डर खत्म: दिनदहाड़े होने वाली इस गुंडागर्दी पर स्थानीय प्रशासन अक्सर आँखें मूंदे रहता है। पुलिस की इस बेरुखी से इन उपद्रवियों का हौसला इतना बढ़ जाता है कि वे खुद को कानून से ऊपर समझने लगते हैं।

​पंडाल, लेजर लाइटें और आधी रात का हुड़दंग

​भीड़भाड़ वाले चौराहों और तंग गलियों में बड़े-बड़े पंडाल खड़े कर दिए जाते हैं, जिससे आपातकालीन वाहनों (अम्बुलेंस, फायर ब्रिगेड) तक का रास्ता बंद हो जाता है।

​चकाचौंध का प्रदर्शन: भक्ति के नाम पर तेज साउंड सिस्टम और आंखों को चुभने वाली कुकिंग/लेजर लाइटें लगाई जाती हैं।

​उत्पात का अड्डा: रात-रात भर जागकर भक्ति गीतों की जगह अश्लील या भड़काऊ गानों पर नाचना, शराब पीकर हुड़दंग मचाना और आने-जाने वाली महिलाओं पर छींटाकशी करना अब आम बात हो गई है। यह धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक शांति पर सीधा हमला है।

​अंधभक्ति और दिशाहीन युवा पीढ़ी

​सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इसमें छोटे-छोटे बच्चों को भी शामिल कर लिया गया है। बचपन से ही धर्म के नाम पर दादागिरी करने, सड़क रोकने और जबरन पैसे वसूलने को ‘साहस’ मान लिया गया है।

​धर्म की गलत परिभाषा: युवाओं की इस नई पीढ़ी को लगता है कि उपद्रव मचाना और दूसरों को परेशान करना ही धर्म की रक्षा है।

​संस्कारों का हनन: जो त्यौहार सामाजिक सौहार्द और एकजुटता का प्रतीक थे, वे अब भय, तनाव और हिंसा का कारण बनते जा रहे हैं।

​बदलाव की सख्त ज़रूरत

​यदि समय रहते इस प्रथा पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो त्यौहार अपनी पवित्रता पूरी तरह खो देंगे। प्रशासन को सड़क रोककर चंदा वसूलने वालों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही, पूजा समितियों को यह समझना होगा कि दूसरों को पीड़ा देकर की गई भक्ति कभी स्वीकार्य नहीं हो सकती।

​सच्ची श्रद्धा पंडालों के आकार या डीजे के शोर में नहीं, बल्कि मन की पवित्रता और समाज के प्रति जिम्मेदारी में होती है।

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