जनसहभागिता से विकसित हुआ बोदरी का श्मशान घाट, मान्यता और मूलभूत सुविधाओं के लिए ग्रामीणों की प्रशासन से गुहार

जनसहभागिता से विकसित हुआ बोदरी का श्मशान घाट, मान्यता और मूलभूत सुविधाओं के लिए ग्रामीणों की प्रशासन से गुहार
बिलासपुर (बिल्हा)। बिल्हा क्षेत्र अंतर्गत ग्राम बोदरी में स्थित श्मशान भूमि जनसहयोग और सामाजिक समर्पण का अनूठा उदाहरण बन चुकी है। एक समय कचरा डंपिंग स्थल के रूप में पहचान रखने वाली इस भूमि को यहां के आम रहवासियों ने अपने निजी संसाधनों और श्रमदान से विकसित कर अंतिम संस्कार के लिए उपयोगी बनाया। आज भी इसका संरक्षण पूरी तरह ग्रामीणों के सहयोग से ही किया जा रहा है, लेकिन इसे शासकीय रूप से मान्यता दिलाने और आवश्यक सुविधाओं के विस्तार के लिए लोग लगातार प्रशासन से मांग कर रहे हैं।

ग्रामीणों ने बताया कि इस श्मशान भूमि के विकास के लिए उन्होंने अपने पैसों से कई महत्वपूर्ण कार्य कराए हैं। यहां स्वयं कुआं खुदवाया गया, बोरवेल कराया गया, ताकि जल की स्थायी व्यवस्था बनी रहे। पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए औषधीय पौधों सहित हजारों पौधों का रोपण किया गया है, जिन्हें ड्रिप सिस्टम के माध्यम से नियमित पानी दिया जा रहा है। अंतिम संस्कार के दौरान होने वाली असुविधा को देखते हुए शवदाह के लिए शेड का निर्माण भी जनसहयोग से कराया गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि इतने कार्यों के बाद भी यहां आने वाले लोगों के लिए विश्राम स्थल (बैठक व्यवस्था) का अभाव है, जिससे अंतिम संस्कार में शामिल होने वाले परिजनों और आगंतुकों को परेशानी होती है। इसके साथ ही इस स्थल को शासकीय रूप से श्मशान भूमि घोषित कर एनओसी जारी करने की मांग लंबे समय से की जा रही है, ताकि भविष्य में इसके विकास के लिए शासकीय योजनाओं का लाभ मिल सके और स्थायी व्यवस्थाएं सुनिश्चित हो सकें।


स्थानीय लोगों और श्मशान भूमि के संरक्षकों का आरोप है कि इस संबंध में कई बार प्रशासनिक अधिकारियों को आवेदन और मौखिक जानकारी दी गई, लेकिन मामला अब तक ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है और संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाया है। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल एक भूमि का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की गरिमा और अंतिम संस्कार जैसी संवेदनशील प्रक्रिया से जुड़ा विषय है।
ग्रामवासियों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि जनसहयोग से विकसित इस श्मशान घाट को आधिकारिक मान्यता देते हुए एनओसी जारी की जाए, विश्राम स्थल का निर्माण कराया जाए तथा अन्य आवश्यक आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, ताकि यहां अंतिम संस्कार सम्मानजनक और सुव्यवस्थित ढंग से हो सके।
जनसहभागिता से तैयार यह श्मशान घाट आज भी ग्रामीणों की मेहनत से संचालित हो रहा है, लेकिन इसके पूर्ण संरक्षण और विकास के लिए प्रशासनिक पहल का इंतजार जारी है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि उनकी वर्षों पुरानी मांगों पर जल्द ही सकारात्मक निर्णय लिया जाएगा।

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