क्या ‘जनदर्शन’ जनता की सच्ची सेवा है या प्रशासनिक विफलता पर पर्दा डालने का महज एक राजनीतिक जरिया?

क्या ‘जनदर्शन’ जनता की सच्ची सेवा है या प्रशासनिक विफलता पर पर्दा डालने का महज एक राजनीतिक जरिया?

​लोरमी के विश्राम गृह में आयोजित उप मुख्यमंत्री अरुण साव का जनदर्शन इन दिनों एक बड़े और गंभीर सवाल को जन्म दे रहा है। एक तरफ जहां स्थानीय विधायक और डिप्टी सीएम खुद जनता की समस्याएं सुनकर मौके पर कुछ मामलों का निपटारा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ यह पूरा आयोजन स्थानीय प्रशासन और सरकारी तंत्र की कार्यशैली पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान लगाता है। जब जाति प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र, वृद्धावस्था पेंशन और प्रधानमंत्री आवास जैसी बुनियादी और सामान्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं के लिए भी लोगों को सीधे उप मुख्यमंत्री के दरबार में अर्जी लगानी पड़े, तो फिर ब्लॉक स्तर के अधिकारी, तहसीलदार, जनपद और पंचायत के दफ्तर क्या सिर्फ कागजी खानापूर्ति के लिए बैठे हैं? यह स्थिति साफ इशारा करती है कि जमीनी स्तर पर प्रशासनिक अमला या तो पूरी तरह नकारा हो चुका है या फिर जनता की समस्याओं के प्रति उसकी संवेदनाएं मर चुकी हैं। आम जनता अब यह भली-भांति समझने लगी है कि स्थानीय स्तर के कर्मचारी और अधिकारी बिना ऊपर से आदेश मिले कोई कार्य करने को तैयार ही नहीं हैं, और जनता को जानबूझकर गुमराह करने तथा टालमटोल करने का यह रवैया इस बात का प्रमाण है कि प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही नाम की कोई चीज नहीं बची है। जनदर्शन में उमड़ने वाली भारी भीड़ और पांच सौ से अधिक आवेदनों का ढेर इस बात की तस्दीक करता है कि जनता का जमीनी प्रशासनिक व्यवस्था से पूरी तरह भरोसा उठ चुका है, और क्या यह इस बात का स्पष्ट संकेत नहीं है कि सरकार के नुमाइंदों को भी अब यह अच्छी तरह समझ आ चुका है कि उनके मातहत अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुंह मोड़ चुके हैं? डिप्टी सीएम अरुण साव ने बड़े-बड़े निर्देश दिए हैं कि जनता को छोटे-छोटे कामों के लिए न भटकना पड़े और अधिकारी संवेदनशीलता के साथ काम करें, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ मौखिक निर्देश देने से लापरवाह और सुस्त पड़ी नौकरशाही सुधर जाएगी? जब तक जनता के कामों में कोताही बरतने वाले और जनता को दौड़ाने वाले अधिकारियों पर सख्त से सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसे जनदर्शन केवल राजनीतिक भाषणबाजी और वाहवाही बटोरने का जरिया बनकर रह जाएंगे। जनता का जनदर्शन में उमड़ना सरकार के प्रति अगाध भरोसे का प्रमाण नहीं, बल्कि स्थानीय प्रशासन की विफलता के खिलाफ जनता की बेबसी और मजबूरी का एक जीता-जागता दस्तावेज है, क्योंकि यदि जनता को अपने हक के कामों के लिए भी मंत्रियों और विधायकों के सामने हाथ फैलाना पड़े, तो इसे सुशासन कहना लोकतंत्र के साथ एक भयंकर मजाक ही होगा।

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