आदर्श मुक्ति धाम बोदरी तहसील अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस समुद्र शास्त्री ने सभी मजदूरों को नमन करते हुए उनके उज्जवल भविष्य के लिए 11 सूत्री कार्यक्रम के माध्यम से आम जनमानस को मजबूत करने का किया आवाहन।

सभी मजदूर भाइयों को उज्जवल भविष्य के लिए 11 सूत्री कार्यक्रम के माध्यम से आम जनमानस को मजबूत करने का किया आवाहन।
आदर्श मुक्ति धाम बोदरी तहसील अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस समुद्र शास्त्री के नेतृत्व में प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण पाल संरक्षक आदर्श मुक्तिधाम, फक्कड़ बाबा सहित ने पावन दिवस पर सभी मजदूरों को नमन किया।
मातृ शक्ति को वंदन अभिनंदन करते हुए सभी माताओ को किया पावन कार्य में सहयोग हेतु आवाहन
लेख-१: मजदूर दिवस पर सभी मजदूरों को कोटि-कोटि नमन व प्रणाम करते हुए एक विशेष लेख समुद्र शास्त्री की कलम से
प्रौढ़ अनुराग: जहाँ आत्माएँ संवाद करती हैं
प्रेम जब आयु की देहलीज लाँघकर ‘प्रौढ़ता’ का वरण करता है, तब वह वासना की राख से निकलकर उपासना का कुंदन बन जाता है। बड़ी उम्र का यह अनुराग संसार की क्षणभंगुर चकाचौंध से परे, देह की सीमाओं को तोड़कर ‘रूहानी धरातल’ पर जा खड़ा होता है। यह वह पड़ाव है जहाँ यौवन का उन्माद नहीं, बल्कि बुद्धत्व की शांति होती है।
जब जीवन के सारे मुखौटे उतर जाते हैं और दिखावे की धूप ढलने लगती है, तब अंतस की गहराई में एक दिव्य ज्योति जलती है। यह प्रेम किसी को ‘जीतने’ की होड़ नहीं, बल्कि स्वयं को किसी में ‘घोल देने’ की साधना है। यहाँ रूप-रंग का आकर्षण गौण हो जाता है और दो परिपक्व आत्माएँ एक-दूसरे की कमियों को ढंकने वाली चादर बन जाती हैं।
”जहाँ शब्द मौन हो जाते हैं और केवल स्पंदन शेष रहता है, वहीँ ईश्वर का साक्षात्कार होता है।”
यह प्रेम माँगता कुछ नहीं, बस समर्पण की अविरल धारा बनकर बहता रहता है। इसमें ईर्ष्या के काँटे नहीं, बल्कि विश्वास के पारिजात खिलते हैं। यह कालजयी है, जो समय के थपेड़ों से और निखरता है और मृत्यु की छाया में भी सुरक्षित रहता है। यह ईश्वर का वह अनमोल उपहार है जो केवल उन्हें मिलता है जिन्होंने जीवन की तपिश में खुद को तपा लिया है।
लेख-२: श्रम की वेदी पर सृजन का शंखनाद
— समुद्र शास्त्री की कलम से
श्रम केवल उदर-पूर्ति का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा का जागरण है। इसे केवल पसीने की बूंदों से न मापिए, यह तो वह ‘साधना’ है जिससे मानवता का प्रासाद खड़ा होता है। जब एक श्रमिक के हाथ चलते हैं, तो केवल मशीनें नहीं घूमतीं, बल्कि सभ्यता के पहिये आगे बढ़ते हैं।
सच्चा श्रम वह है जिसमें शरीर के साथ-साथ मन, बुद्धि और चेतना का महासंगम हो। जब कर्म में ‘ममत्व’ जुड़ जाता है, तो पत्थर भी प्रतिमा बन जाता है और पसीना भी गंगाजल की तरह पवित्र हो जाता है। आज के यांत्रिक युग में हमने श्रमिक को केवल एक ‘संसाधन’ मान लिया है, जो हमारी सबसे बड़ी भूल है। श्रमिक एक भावनात्मक इकाई है; यदि उसका हृदय प्रसन्न है, तो उत्पादकता स्वयं ही नवोन्मेष का रूप ले लेगी।
१ मई: आत्म-चिन्तन का पर्व
विश्व श्रमिक दिवस केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं, बल्कि हमारे लिए आत्म-बोध का क्षण है। क्या हम उस हाथ को सम्मान दे पा रहे हैं जो हमारे सपनों की नींव भरता है?
”श्रम की पूजा ही ईश्वर की सच्ची अर्चना है। जिस दिन हम श्रमिक को सम्मान, सुरक्षा और आत्मीयता का कवच देंगे, उसी दिन राष्ट्र प्रगति के ‘शिखर-कलश’ को स्पर्श करेगा।”
आइये, इस दिवस पर यह संकल्प लें कि हम श्रम की गरिमा को ‘साधना’ मानकर पूजेंगे और हर श्रमिक के जीवन में स्वाभिमान का दीप जलाएंगे।
कृत: पंडित श्रवण दुबे ‘समुद्र शास्त्री’

